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सावित्रीबाई का यही कॉन्ट्रिब्यूशन है इस देश के लिए

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 10, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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सावित्रीबाई का यही कॉन्ट्रिब्यूशन है इस देश के लिए

तस्वीर मत देखिए, तस्वीर का विन्यास देखिए, एक लड़की है जो स्पीच दे रही है, तेलगु भाषी, पहनावा दक्षिणी, बगल में रोहित वेमुला की स्टेच्यू है और जगह हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी. ये वही यूनिवर्सिटी है जिसके बारह बाई बारह के एक कमरें में रोहित ने अपनी अंतिम सांस ली थी. रोहित और लड़की के ठीक बीच में एक और औरत है, सावित्रीबाई फुले.

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नारे लगाने वाले पुरुष और स्पीच देती लड़की, इस देश के शैक्षणिक इतिहास में ये तस्वीर ही सावित्रीबाई का कॉन्ट्रिब्यूशन है. अगर ये औरत न होती तो स्पीच देती ये लड़की भी न होती. ऋग्वेद काल में गिनी-चुनी पांच औरतें ही थी, जिन्होंने ऋग्वेद की ऋचाएं लिखीं थीं – गार्गी, मैत्रेयी, अप्पला, घोषा. इन्हीं पांच अभिजातीय औरतों के नाम बार-बार गिनाकर, हमने मान लिया कि हमारे समाज में तो औरतें पढ़ा करती थी. हम तो एक पढ़ी-लिखी हुई सभ्यता हुआ करते थे लेकिन गर्व करने वाले उस पल में हम इस बात को भुलाते रहे कि ऋग्वेद के बाद ‘स्मृतियां’ आईं. जिनमें समाज के नियम, कायदे- कानून लिखे गए. नारद स्मृति, मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति. इन्हीं स्मृतियों ने आदेश दिया कि औरतें नहीं पढेंगी, शूद्र भी नहीं. वैसे शूद्रों के पढ़ने का अधिकार तो ऋग्वेद काल के अंत में ही छीन लिया गया था. इतिहास पढ़ने वाले जानते होंगे उसे ‘उत्तर ऋग्वैदिक काल’ कहा जाता है.

स्मृतियों के बाद आए ‘पुराण’, जो संख्या में 18 थे. पुराणों ने स्मृतियों के रूढ़िवादी आदेशों को ही परम्परा मान लिया. गलती सुधारने की जगह उसे स्थायी कर दिया. अक्सर पहली पीढ़ियों के ढकोसले, अगली पीढ़ी के लिए परम्परा बन जाते हैं, अंग्रेजी में इसे ही कहा गया है कि ‘Traditions are just peer pressure from dead people’ यहां पर भी यही हुआ. साल दर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी, औरतें चूल्हे पर सीमित कर दी गईं, शूद्र नालियों और खेतों पर कर दिए गए लेकिन पुराण स्मृतियों के मुकाबले कुछ लिबरल रहे और नया आदेश दिया कि पढ़ तो नहीं सकते, न स्त्री, न शूद्र लेकिन धार्मिक ग्रन्थ सुन सकते हैं. इस तरह पुराणों और वेदों को सुनने की अनुमति पुराण काल में थी लेकिन पढ़ने की नहीं.

इसके बाद गुप्तकाल आया, और इसके भी बाद बंगाल-बिहार क्षेत्र में पाल वंश आया. नए राजा बने, नयी यूनिवर्सिटीयां बनी. नालंदा, विक्रमशिला. जिन पर प्रधानमंत्री से लेकर हर दक्षिणपंथी औंधी, पौंधी डकारें भरता है. वैसे फक्र करने वाली चीज भी है लेकिन क्या आपने कभी गौर किया कि नालंदा और तक्षशिला में कितने शूद्र और कितनी स्त्रियां पढ़ती रही होंगी ? मेरी नानी-सा अपढ़ थी, इससे कुछ अधिक तरक्की हुई तो मेरी मां स्कूल की दो क्लास पढ़ सकी. इससे कुछ और अधिक तरक्की हुई तो मेरी दोनों बहनें बारह पास कर गईं लेकिन इसके आगे जो मेरी बेटी होगी, वह स्कूल भी जाएगी, बारहवीं भी पढ़ेगी, यूनिवर्सिटी भी जाएगी, अपनी पसन्द का साथी भी चुनेगी. और इसी लड़की की तरह स्पीच भी देगी. ऐसे ही पीढ़ियां बदलती हैं. ये जो लड़की है जिसे स्पीच देने की सुविधा मिली है, ऐसी सुविधा इसकी मां को न मिलती रही होगी लेकिन इस लड़की को मिली है क्योंकि एक दिन इसी देश में एक दूसरी औरत थी, जो कॉपी-किताब लेकर सड़कों पर निकली थी. उसी की वजह से ये लड़की स्पीच दे पा रही है, उसी की वजह से मेरी बेटी दे पाएगी. सावित्रीबाई का यही कॉन्ट्रिब्यूशन है इस देश के लिए.

  • श्याम मीरा सिंह

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