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स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व बनाम आरएसएस

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 25, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व बनाम आरएसएस

आरएसएस और बीजेपी द्वारा परिभाषित राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व पर आज देश भर में बहस चल रही है. लोकप्रियता को देखते हुए संघ परिवार के लोग नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, आजाद, बाबा साहब भीमराव अंबेदकर की प्रतिमा पर फूल-माला जरूर चढ़ाते हैं, पर इनके विचारों को, इनकी रचनाओं को कभी जनता के बीच ले जाने की कोशिश नहीं करते. क्योंकि, ऐसा होने पर यह साबित हो जायेगा कि इन महापुरुषों के विचार आरएसएस और संघ परिवार के विचारों के बिल्कुल विपरीत रहे हैं. इस स्थिति में आरएसएस के पास सिर्फ एक ही मनीषी का नाम बचता है, जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वैचारिक धरातल में उनके साथ खड़े हैं और वो नाम है स्वामी विवेकानंद का.

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संघ परिवार से संबंधित छात्र-युवा संगठन हों या फिर राजनैतिक संगठन, हर जगह स्वामीजी की तस्वीर लगायी जाती है. भगत सिंह की रचनाओं से उद्धरण देने में आरएसएस के लोग जरूर बचते हैं, परंतु स्वामी विवेकानंद को अपनी सुविधानुसार जरूर ‘कोट’ करते हैं. प्रस्तुत आलेख में हम यह पड़ताल करेंगे कि क्या वाकई आरएसएस व संघ परिवार स्वामी विवेकानंद के विचारों पर चल रहे हैं ?

हिन्दू राष्ट्र के प्रसंग में

सबसे पहले हम उद्धरण देंगे आरएसएस के प्रमुख विचारक श्री गोलवलकर की रचनाओं से. गोलवलकर जी कहते हैं, ‘‘हिन्दुस्तान के सभी गैर हिन्दुओं को या तो हिन्दू भाषा और संस्कृति अपनानी होगी. वे हिन्दू राष्ट्र की गौरवगाथा के अतिरिक्त अन्य किसी विचार को प्रश्रय नहीं देंगे और हिन्दू नस्ल में मिल जाने के लिए अपने पृथक अस्तित्व को उन्हें खो देना होगा या उन्हें बगैर किसी मांग के और बगैर किसी विशेषाधिकार के, बगैर किसी तरह की रियायत के, यहां तक कि बगैर किसी नागरिक अधिकार के इस देश में पूरी तरह से हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहना होगा’’ (We And Our Nationhood Defined – M.S. Golwalkar).

अब देखा जाए इस मामले में स्वामी विवेकानंद क्या कहते हैं ? उन्होंने कहा था, ‘‘मैं एक हिन्दू हूं, पर मैं किसी पर भी इसे थोपने के खिलाफ हूं.’’ उन्होंने आगे कहा था, ‘‘ईसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं बनना पड़ेगा. मुसलमान को हिन्दू या ईसाई को बौद्ध नहीं बनना पड़ेगा. ….हम मानवजाति को उस मुकाम पर ले जाना चाहते हैं, जहां वेद नहीं होगा, बाइबिल नहीं होगी और न ही कुरान होगा. बल्कि सभी काम वेद, बाइबिल और कुरान के समन्वय से पूरे होंगे. हम सिर्फ सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता नहीं रखते, बल्कि हम सभी धर्मों को सत्य भी मानते हैं. सभी को यह अधिकार है कि वे चाहे जिस पंथ को चुन ले.’’ (स्वामी विवेकानंद की वाणी और रचना – उद्बोधन कार्यालय).

उन्होंने आगे कहा, ‘‘यदि मेरा कोई बेटा होता, तो ध्यान लगाने और साथ में एक पंक्ति की प्रार्थना व मंत्र जाप के अलावा मैं उसे किसी तरह की धर्म की बात सीखने नहीं देता. बड़ा होकर और विभिन्न रायों और परामर्शों को सुनते हुए वह उन सबसे अवगत हो जाता, जो उसे सत्य लगते इसलिए ये नितांत स्वाभाविक है कि एक ही साथ पूरी तरह से स्वतंत्रा और निर्विघ्न रूप से मेरा बेटा बौद्ध, मेरी पत्नी ईसाई और मैं स्वयं मुसलमान हो सकता हूं.’’ (वही).

उन्होंने कहा था कि भारत में दो महान विचारधाराओं का समन्वय करना होगा. हमारा देश ऐसा होगा जिसका मस्तिष्क वैदांतिक होगा और शरीर इस्लाम का (The Complete Works of Swami Vivekanand Volume-6). क्या आरएसएस के लोग खुद को स्वामी विवेकानंद से बड़ा हिन्दू मानते हैं ?

आरएसएस और संघ परिवार जैसे संगठनों का निर्माण ही हुआ है भारत को हिन्दूराष्ट्र में तब्दील करने के लिए. आइए देखें कि इस विषय में स्वामीजी क्या कह रहे हैं ? ‘‘अतीत में ‘हिन्दू’ शब्द से सिंधु नदी के पूर्वी छोर पर बसनेवाले लोगों को समझा जाता था. उस समय इस शब्द की एक प्रासंगिकता थी. पर अब यह शब्द निरर्थक हो चुका है. उस शब्द के द्वारा वर्तमान हिन्दू धर्म या जाति-कुछ भी परिभाषित नहीं होता है. सिंधु नदी के पूर्वी छोर पर तो अभी विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहते हैं।’’ (स्वामी विवेकानंद की वाणी और रचना – उद्बोधन कार्यालय, खंड -5 पृः 265).

उन्होंने आगे कहा है, ‘‘वेदांत में किसी सम्प्रदाय, धर्म या जाति को आधार नहीं माना गया है. फिर यह धर्म कैसे भारत का राष्ट्रीय धर्म हो सकता है ?’’ (3/286द्).

आरएसएस सिर्फ राष्ट्रवाद की नहीं हिन्दू राष्ट्रवाद की बात करता है. स्वामीजी कहते हैं, ‘‘अंत में धर्म को महज लफ्फाजी में तब्दील कर दिया गया है. ये जो जीवन में उतारने का विषय है, इसे ही भूला दिया गया है. अब धर्म को लोग ‘पैत्रिक धर्म’, ‘राष्ट्रीय धर्म’, ‘जातीय धर्म’ आदि की संज्ञा से परिभाषित करने लगे हैं. अब तो किसी धर्म के अनुयायी होने मात्रा को लोग राष्ट्रप्रेम की संज्ञा देने लगे हैं.’’ (वही 3/109).

मुसलमानों के प्रसंग में

अब आते हैं मुस्लिमों के प्रसंग में. यह तो जगजाहिर है कि आरएसएस व संघ परिवार किस कदर मुस्लिम विरोधी हैं ! इनके लिए राष्ट्रीयता का मतलब ही है मुस्लिम मुक्त हिन्दू राष्ट्र. आरएसएस चिंतकों का कहना है कि इस देश में इस्लाम का विस्तार मुसलमान बादशाहों ने हथियारों के बल पर किया है. भाजपा के प्रवक्ता श्री विजय सोनकर शास्त्री ने हाल ही में ‘हिन्दू वाल्मीकि जाति, हिन्दू चर्मकार जाति’’ शीर्षक एक किताब लिखी, जिसका लोकार्पण आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत जी ने किया. इस किताब में उन्होंने लिखा है, ‘‘भारत में कभी छुआछूत नहीं था. इस्लामी आक्रमण के बाद ही इस देश में छुआछूत की परंपरा तैयार हुई. इस्लामी आक्रमण के बाद ही इस देश में अछूत, दलित और भारतीय मुसलमान पैदा हुए.’’

आइए अब देखते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने इस विषय में क्या लिखा है ? उन्होंने लिखा है, ‘‘मुस्लिमों की भारत विजय पददलितों और गरीबों का मानो उद्धार करने के लिए हुई थी. यही वजह है कि हमारे देश की आबादी के पांचवें हिस्से की जनता मुसलमान बन गयी थी. यह सारा काम तलवार से नहीं हुआ था. यह सोचना कि यह सब तलवार और आग का काम था, बेहद पागलपन के सिवा कुछ नहीं है.’’ (भारत का भविष्य, वाणी और रचना संग्रह) ‘‘….यह सब मिथ्या बकवास है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला. जमींदारों और पुरोहितों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया.’’ (पत्रावली, भाग: 3ए पृ: 330, नया भारत गढ़ो).

‘‘हमारे बांग्लादेश में, जहां अधिकतर जमींदार हिन्दू हैं, वहां किसानों में देखिएगा ज्यादातर मुसलमान हैं. क्यों ये लोग मुसलमान नहीं होंगे ? हमने उनके लिए किया ही क्या है ? धर्मांतरण के लिए दूसरों को दोष मत दो, दोष यदि देना है तो अपने धर्म को दो.’’ (वाणी और रचना – उद्बोधन कार्यालय, 8/26). संघी नेताओं के उग्र मुस्लिम विद्वेष से अलग स्वामीजी ने कहा था, ‘‘आप पूछ सकते हैं कि मुहम्मद के धर्म में आखिर क्या अच्छी चीज हो सकती है ? मुहम्मद साम्यवाद के आचार्य हैं, भाईचारे के प्रतीक हैं, ईश्वर प्रेरित पुरुष हैं।’’ (वही, 8/229).

उन्होंने आगे कहा है कि जब भी कोई सज्जन मुस्लिम धर्म ग्रहण करता है, तो सम्पूर्ण मुस्लिम समाज उसे भाई के रूप में सीने से लगा लेता है. ऐसा और किसी धर्म में नहीं है. (वही, 3/137). पुरोहित प्रथा हमेशा से ही कापफी निर्मम और अमानवीय रही है. इस प्रथा को एकदम जमींदोज कर देना, यदि ऐसा कहीं हुआ है तो इस्लाम में ही हुआ है. (वही, 3/254). स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा था, ‘‘वर्षों मैं इस व्यक्ति के साथ रहा हूं, परंतु कभी इनके मुख से किसी भी सम्प्रदाय के खिलापफ एक शब्द भी नहीं सुना. उन्होंने सभी धर्मों को अपनाया था (जाहिर है इस्लाम भी), और अलग-अलग पंथों को, एक ही लक्ष्य पर पहुंचने का साधन बताया था।’’ (वही, 10/163).

मुगल शासनकाल

मुगल शासनकाल को आरएसएस विचारक, हिन्दुओं पर जबरदस्ती और जुल्म के एक ऐतिहासिक दौर के रूप में दिखाते हैं. परंतु स्वामीजी कहते हैं, ‘‘इतिहास में देखो, पठान लोग इस देश में आए, परंतु यहां जड़ें नहीं जमा पाएं क्योंकि उन्होंने हिन्दू धर्म पर चोट किया था. परंतु मुगल शासक इस देश में प्रतिष्ठित हुए, कैसे ? मुगल शासक इस जगह पर (हिन्दू धर्म पर) कभी चोट नहीं किया. हिन्दू ही तो मुगल शासन के आधार थे. जहांगीर, शाहजहां, दारा शीकोह – इन सबों की माताएं तो हिन्दू ही थीं.’’ एक शिष्य द्वारा एक बार गलती से शाहजहां को विदेशी कहने पर स्वामीजी ने कहा था, ‘‘शाहजहां खुद को यदि ‘विदेशी’ संबोधन करते हुए सुन लेते, तो कब्र के भीतर से भी उठकर देखते कि कौन उन्हें ऐसा कह रहा है।’’ (The Master as I saw him – Sister Nivedita).

सिस्टर निवेदिता ने इसी किताब में लिखा है कि शहंशाह अकबर के बारे में कहते हुए स्वामीजी भावुक हो जाते थे. शाहजहां के बारे में कहते थे कि ऐसा सौन्दर्यबोध ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. दाराशिकोह को स्वामीजी ‘भारतीय राजपुत्र’ कहकर पुकारते थे. इन बातों को आरएसएस के प्रचारक भरसक छुपाने की कोशिश करते हैं, पर यदि इनका प्रचार-प्रसार हो, तब स्वामीजी को भी भाजपा के मार्गदर्शक मंडल की भांति ही ब्लैकलिस्टेड या हाशिए पर ध्केलने में इन्हें देर नहीं लगेगा.

मंदिर के प्रसंग में

अब आइए, जरा मंदिर प्रसंग पर भी चर्चा हो जाय. बाबरी मस्जिद तोड़ने के बाद कहा गया था कि यह तो अभी झांकी है, काशी मथुरा बाकी है. इस देश में मंदिर निर्माण को ही आरएसएस के लोग सर्वाधिक प्राथमिकता देते हैं. मंदिर निर्माण नहीं हुआ, तो हिन्दू धर्म खतरे में होगा. अब आइए इस विषय में स्वामीजी को सुनते हैं, ‘‘हिन्दू धर्म में देवमंदिर का उतना महत्व नहीं है. यदि सब मंदिर टूट जाएं, उससे हिन्दू धर्म को कुछ नुकसान नहीं होगा. जो व्यक्ति कभी मंदिर नहीं जाता, वह रोज मंदिर जाने वाले व्यक्ति से किसी भी सूरत में कमतर नहीं है. अपितु जो कभी मंदिर नहीं जाता, वही सज्जन ज्यादा धार्मिक है, क्योंकि भारत में धर्म सभी की निजी आस्था का मामला है और लोग अपने घरों में, एकांत में, साधना के द्वारा ही मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं. लोग स्वर्गकाम या पुत्राकाम होकर मंदिर बनवाते हैं.

कोई एक विशाल मंदिर बनवाकर वहां पुरोहित रख सकते हैं. परंतु मुझे वहां जाने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि मेरी पूजा तो घर में ही होती है.’’ (वही, 2/352). स्वामीजी ने कहा, ‘‘जीवित ईश्वर तुम्हारे साथ हैं और तुम लोग मंदिर-चर्च बनवा रहे हो और काल्पनिक मिथ्या वस्तु पर आस्था रखते हो. मानव ही ईश्वर है. इंसान ही सर्वश्रेष्ठ मंदिर है.’’ (वही, 2/191).

अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण हिन्दू मंदिर तोड़कर किया गया था. तुलसीदास सहित अन्य कई समकालीन चिंतक और लेखकों की रचनाओं में इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है, पुरातात्विक तौर पर भी इसके कोई सबूत नहीं मिले हैं, परंतु फिर भी यदि तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए कि सचमुच ऐसा ही हुआ था, तो क्या तब भी बाबरी मस्जिद गिराना उचित कदम था ? स्वामीजी ने खुद ही कहा है कि पुरी का जगन्नाथ मंदिर एक बौद्ध मठ को तोड़कर बनाया गया था. तो क्या इस मंदिर को तोड़कर फिर से बौद्ध मठ बनवाया जाए ? बौद्ध लोग इसके लिए दावा भी ठोक चुके हैं.

स्वामीजी कहते हैं, ‘‘ये जो तुम लोग संन्यासियों का मठ-मंदिर देख रहे हो, यह सब कभी बौद्ध मठ हुआ करता था. हिन्दू लोगों ने इसी पर कब्जा कर लिया है.’’ (वही, 9/28).

यह इतिहास है कि हिन्दू राजाओं ने हजारों की संख्या में बौद्ध मठों को तोड़कर, हिन्दू मंदिरों की स्थापना की थी. परंतु क्या इस आधुनिक युग में जबकि महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार जैसे अभिशाप से देश जूझ रहा हो, वहां हम मंदिर-मस्जिद तोड़ने और बनवाने में अपनी उर्जा को इस तरह बर्बाद करेंगे ? स्वामी विवेकानंद से भी बड़े हिन्दू और मठाधीश लोगों को इससे कोई मतलब नहीं. उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है मंदिर.

राम का जन्म कहां हुआ था, उस स्थान को भी इन लोगों ने ढूंढ़ निकाला है और वहीं मंदिर निर्माण की कवायद चल रही है. इस मुद्दे पर कई चुनावों में नैया भी पार लग गयी है. पर स्वामी विवेकानंद ने इस विषय में क्या कहा था ? बकौल स्वामीजी, ‘‘रामायण को ही ले लीजिए, एक महान ग्रंथ के रूप में इस ग्रंथ को स्वीकार करने पर ही मुझे राम की तरह यथार्थ में कोई था, यह मान लेना होगा, ऐसा नहीं है. हर धर्म में दार्शनिक पहलू के साथ-साथ पौराणिक भाग भी रहता है. इस भाग में दार्शनिक प्रस्थापना के अनुरूप कपोलकल्पित कहानी, अलौकिक किस्से आदि शामिल रहते हैं.

…यदि तुम सच्चे भक्त हो, तो श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा या ब्रज, कहां हुआ था इस विषय में जानने की कोई जरूरत नहीं. श्रीकृष्ण ने ठीक किस समय गीता का उपदेश दिया था, ये सब जानने की जरूरत नहीं है. गीता में कर्तव्य और प्रेम के बारे में जो सीख है, उसे अपने जीवन में अनुसरण करना ही तुम्हारा कर्तव्य है.’’ (वही, 4/20). पर स्वघोषित हिन्दुत्ववादी स्वामीजी के तमाम विचारों को ताक पर रखकर राजनैतिक रोटी सेंक रहे हैं. और वे इसे गर्व के साथ कहते भी हैं.

धर्म और राजनीति

आडवानी जी ने तो कहा ही था, ‘‘सिर्फ मंदिर मुद्दे के कारण भाजपा की सीट 2 से 119 तक पहुंच गयी है. फिर हम इस मुद्दे को क्यों हाथ से जाने दें ?’’ और आरएसएस के विचारक, पांचजन्य के लेखक, जो कि बातों को इतना स्पष्ट रूप में नहीं बल्कि सलीके से घुमा-फिराकर कहते हैं, उनके अनुसार धर्म के बिना राजनीति तो शैतानी है. धर्म तो समाज को चलाने का आधार है. फिर राजनीति धर्म से कैसे मुक्त हो सकती है ? इसलिए वे खुले तौर पर धर्म को राजनीति के साथ मिलाने की वकालत करते हैं. पर इस विषय में स्वामी विवेकानंद क्या कहते हैं ? उन्होंने लिखा है कि ‘‘धर्म को कभी भी समाज के विधानदाता नहीं बनना चाहिए. दूसरों के अधिकार पर हस्तक्षेप मत करो, अपने दायरे में रहो।’’ (वही, 6/314).

‘‘धर्म का यह कार्य क्षेत्र ही नहीं है कि सामाजिक नियमों को बनाने में कोई संबंध रखे. …सामाजिक नियमों को तो आर्थिक स्थिति के आधार पर ही बनाया गया था. धर्म की सबसे भयानक व बड़ी गलती समाज के मामलों में हस्तक्षेप करना था. …यह भी सच है कि हम कतई नहीं चाहते कि धर्म समाज सुधारक की भूमिका ग्रहण करे. साथ-साथ हम इस बात पर भी जोर देते हैं कि धर्म को नियम-कानून बनाने का अधिकार न दिया जाए. अपनी खाल में अपने तक ही सीमित रहें-अपने आप हर चीज सही हो जायेगी … किसी भी सम्प्रदाय या समिति में धर्म को संकुचित नहीं होना चाहिए, ऐसा होने पर धर्म, व्यापार में तब्दील हो जाता है. और जहां bभी यह व्यापार में तब्दील होता है, वहीं धर्म का अंत हो जाता है.’’ (वही, 8/257).

धर्म और तर्क-विज्ञान

आज आरएसएस, संघ परिवार और भाजपा पूरे देश में उग्र हिन्दू कट्टरपंथ के आधार पर साम्प्रदायिक उन्माद, तनाव और हिंसा का वातावरण तैयार कर रहा है. कलबुर्गी, पनसारे, दाभोलकर की हत्या क्यों हुई ? इनका अपराध ही क्या था ? क्यों हत्या से पहले आरएसएस व भाजपा खेमे से लगातार इन लोगों को जान से मारने की धमकी दी गयी ?

दरअसल इन लोगों ने हिन्दू धर्म के कई रीति-रिवाजों, नियमों को तर्क व विज्ञान के आधार पर टटोलने की कोशिश की. हिन्दुत्ववादियों का कहना है कि इस विषय में हम कुछ सुनना नहीं चाहते हैं, ये हमारी आस्था का सवाल है, इस पर जो सवाल उठायेगा, उसका सर कलम कर दिया जायेगा.

स्वामी विवेकानंद यदि जीवित होते, तो इनके खिलाफ ही सबसे पहले जंग शुरू करते. स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘‘धर्म जो कुछ भी कहता है, उन सभी बातों को तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए. सभी धर्म, तर्क की कसौटी पर परखने से क्यो ंइन्कार करते हंै? क्योंकि आधार में ही गलती है. मैं तो पूरे वेद को भी नहीं मानता. मैं वेद की सिपर्फ उन बातों को ही ग्रहण करता हूं, जितनी कि तर्क के साथ मेल खाती हों.’’ (वही, 3/173).

वे पुनः एक दूसरी जगह पर कहते हैं, ‘‘…धार्मिक कट्टर लोगों के बारे में जरा सोचिए ! अतीत में इन्होंने क्या किया ? इनके हाथों में यदि सत्ता आ जाए, तो कल ही ये लोग पूरी दुनिया को खून की नदियों में डूबो देंगे. …अन्य बीमारियों की तरह कट्टरपन भी एक बीमारी है. एक भयानक बीमारी है. इंसान की जितनी बुराईयां हो सकती हैं, कट्टरपन इन सभी का पालन-पोषण करता है. इससे क्रोध प्रज्वलित होता है और इंसान हिंसा पर उतारू हो जाता है.’’ (वही, 3/110.)

‘‘…जब विचार शून्य हो जाता है, भावावेग प्रबल हो उठता है, तब धार्मिक कट्टरता साम्प्रदायिकता में तब्दील हो जाती है और ऐसा होने पर हजारों आदमी एक-दूसरे के गले पर छुरी चलाने के लिए थोड़ा-सा भी संकोच नहीं करते.’’ (वही, 3/204).

‘‘हम देखते हैं कि सभी धर्म के कट्टरपंथी अपने धर्म की रक्षा के लिए एक ही हथियार का इस्तेमाल करते हैं, वह है दूसरे धर्म के प्रति घृणा का भाव तैयार करना. यह प्रवृत्ति कुछ हद तक कुत्तों की प्रवृत्ति जैसी है. अपने मालिक की सम्पत्ति की रक्षा करने के लिए कुत्ता जैसा करता है, यह भी वैसा ही है. परंतु इस मामले में कुत्ता थोड़ा बेहतर है. वह किसी भी हाल में अपने मालिक को दुश्मन समझने की गलती नहीं करता. परंतु एक धर्मांध, कट्टर व्यक्ति यह विचार भी खो देता है.’’ (वही, 4/5).

राजनीतिक सिद्धांत

अग्नियुग के मशहूर क्रांतिकारी हेमचंद्र घोष और उनके कुछ साथी गये थे स्वामीजी के पास. उन्होंने स्वामीजी से कहा ‘‘मुझे कोई धार्मिक उपदेश दें.’’ स्वामीजी सिंह गर्जना कर बोले, ‘पराधीन लोगों का कोई धर्म नहीं होता है. तुम्हारा पहला धर्म है देश को विदेशी गुलामी से मुक्त करना. उसके बाद मेरे पास आना धर्म उपदेश के लिए.’’

स्वामीजी की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने तो प्रत्यक्ष तौर पर सशस्त्र क्रांतिकारियों का साथ दिया था, अंग्रेजी हुकूमत के
खिलाफ उन्होंने बगावत की थी. स्वामीजी का भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त अंग्रेजों के जेल में कई सालों तक रहे. परंतु आरएसएस को हम कहां पाते हैं ? ब्रिटिश विरोधी इस आजादी आंदोलन में आरएसएस कभी शामिल नहीं हुई, जबकि इसका गठन 1925 में ही हो गया था.

आजाद हिन्दुस्तान का स्वरूप क्या होगा ? इस विषय में स्वामीजी हमेशा समाजवाद की परिकल्पना करते थे. उन्होंने कहा था – ‘‘भारत की जनता दिलो दिमाग से समाजवादी है.’’ स्वामी विवेकानंद के भाई श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त ने उन्हें एक समाजवादी के रूप में चित्रित किया है. स्वामीजी ने खुद कहा है कि -‘‘मैं एक समाजवादी हूं.’’ पर आरएसएस व भाजपा के लोगों को समाजवाद शब्द से नफरत है.

हम सभी जानते हैं कि आजादी के बाद भारत में समाजवाद कहीं था तो वह संविधान के पन्नों में. हकीकत में कहीं समाजवाद साकार रूप नहीं लिया. पर संघ परिवार को इसमें भी आपत्ति है, वे संविधान के पन्नों से भी ‘समाजवाद’ शब्द को हटाना चाहते हैं. स्वामीजी इस पूंजीवादी सभ्यता के कठोर आलोचक थे, उन्होंने ‘शूद्रराज’ कायम होने की कल्पना की थी, जो
दरअसल मजदूर-किसानों का राज होगा. मुट्ठीभर पूंजीपति अपने लोभ के कारण जिस प्रकार मेहनकशों को लूटते हैं, उसके खिलाफ विवेकानंद का हुंकार आज भी प्रासंगिक है.

पर इस मामले में भाजपा और आरएसएस कहां खड़े हैं ? यह जगजाहिर बात है कि भाजपा पूंजीपतियों की पार्टी है, इनकी सारी नीतियां उन्हीं के हित में तैयार होती है.

धर्म, मानवता और संवेदना

शिकागो के महाधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकांनद की उपस्थिति, उनका ऐतिहासिक भाषण, हम देशवासियों के लिए गर्व का विषय है. आरएसएस विचारक कहते हैं कि स्वामीजी शिकागो गये थे, हिंदू धर्म को पूरे विश्व में प्रतिष्ठित करने के लिए, और उन्होंने ऐसा कर दिखाया. परंतु ऐसा नहीं था. खुद स्वामीजी कह रहे हैं कि … ‘‘आपमें से बहुत लोग यह जानते हैं कि मैं अमरीका गया था धर्म महासभा में भाग लेने के लिए. नहीं, मैं वहां गया था, क्योंकि देश की जनता की दुर्दशा को दूर करने का भूत मुझमें सवार हो गया था. …धर्म महासभा को लेकर मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी. यहां, मेरा हाड़-मांस का देशवासी मर रहा है, उसकी खबर कौन लेता है ?’’ दरअसल स्वामीजी वहां गये थे देश की गरीब जनता के लिए, उनके कल्याण के लिए आर्थिक सहायतार्थ. हर युग के बड़े मनीषियों की तरह ही स्वामी विवेकानंद को भी मजलूम, शोषित, गरीब जनता, पीड़ित मानवता ने रुलाया, उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया. दीवाने की तरह वे देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भ्रमण करते रहे. यही है वह संवेदना, जो मनुष्य को इंसान बनाता है, इसीलिए तो मनुष्य श्रेष्ठतम जीव कहलाता है.

पर ये संवेदना आज के हिन्दुत्ववादियों में कहां ? आज भाजपा सरकार द्वारा देश भर में भयावह जनविरोधी नीतियां थोपी जा रही हैं. किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. भाजपा के हिन्दुत्ववादी मंत्राी बयान दे रहे हैं कि आजकल आत्महत्या करना भी फैशन हो गया है. क्या इन लोगों को विवेकानंद का उत्तराधिकारी कहा जा सकता है ?

हिन्दुत्ववादी सरकार आज मजदूरों को उनके तमाम अधिकारों से वंचित कर नौकरी से छंटनी कर रही है. महंगाई बढ़ रही है. गरीबी और बेरोजगारी सभी रिकाॅर्ड तोड़ रही है. इस परिस्थिति में इन तथाकथित हिन्दुत्ववादियों का इन सबसे कोई वास्ता नहीं है, वे मंदिर-मस्जिद और धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर चिंतित हैं. स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘‘जो भगवान यहां मुझे अन्न नहीं दे सकते, वे मुझे स्वर्ग में अंततः सुख प्रदान करेंगे – ऐसा मैं नहीं मानता.’’ (7/26).

वे कहते हैं, ‘‘यदि भला चाहते हो, तो इन घंटियों को गंगा में फेंककर साक्षात् भगवान नर-नारायण – मानवदेही हर आदमी की पूजा करो …करोड़ों रुपये खर्च कर काशी-वृदांवन के देवालयों के दरवाजे खुल रहे हैं और बंद हो रहे हैं. यह देवता कपड़े  बदल रहे हैं, तो वे देवता भोजन कर रहे हैं. … इधर जीवित देवता बिना अन्न के, बिना ज्ञान के मर रहे हैं.’’ (7/52)

‘‘… जिस देश में करोड़ों लोग महुआ के फूल खाकर जीवन निर्वाह करते हैं और दस-बीस लाख साधु तथा दसियों करोड़ ब्राह्मण उन गरीबों का खून चूसकर पी जाते हैं और उनकी तरक्की के लिए कोई कोशिश नहीं करते, क्या वह देश है या नर्क ? क्या वह धर्म-कार्य है या कि पैशाचिक-नृत्य.’’ (6/322).

‘‘…फेंक दो तुम्हारे शास्त्रों को गंगा की धार में. देश के लोगों को पहले भोजन जुटाने की तरकीब तो बताओ, फिर अपनी भागवत पढ़कर सुनाना।’’ (9/104) ‘‘…भारत के चिरपतित बीसियों करोड़ नर-नारियों के लिए किनका मन रो रहा है ? उनकी मुक्ति का उपाय क्या है ? बताओ, उनके लिए किनका मन रोता है ? वे अंधेरे से प्रकाश में नही ंआ पा रहे हैं, उन्हें शिक्षा नहीं मिल रही है. बताओ, कौन उनके पास प्रकाश लेकर जायेगा ? ये ही तुम्हारे ईश्वर हों, ये ही तुम्हारे देवता हों, ये ही तुम्हारे पूज्य हों. (7/59).

उपरोक्त विचारों के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि आज यदि स्वामीजी जीवित होते तो अवश्य ही भारत की दु:खी, गरीब और सतायी हुई जनता के लिए आवाज उठाते, विरामहीन संघर्ष करते और उनके संघर्ष के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक बनते आज के हिन्दुत्ववादी. इसलिए उनके खिलाफ ही स्वामीजी को सबसे तीखी लड़ाई लड़नी पड़ती.

  • अमित राय

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'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

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