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आर्तग़ाल ग़ाज़ी : एक फ़ासीवादी सीरियल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 30, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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आर्तग़ाल ग़ाज़ी : एक फ़ासीवादी सीरियल

इतिहास हमेशा सत्ता के इशारे पर ही लिखा जाता है. इतिहास पर आधारित फिल्मों में हमें इतिहास बस उतना ही मिलता है जितना सत्ता चाहती है. ये पूर्ण रूप से टर्की की मौजूदा सत्ता के प्रोपोगंडे का एक बेहतरीन नमूना है. बहुत सी ऐसी तसवीरें भी सामने आई हैं कि जिसमें इस सीरियल के सेट पर तुर्की के राष्ट्रपति तमाम आर्टिस्ट के साथ देखे जाते हैं.

एक लम्बे अरसे से इस विषय पर लिखना चाहता था, करीब एक साल पहले से जब इस सीरियल के कुछ एपिसोड देखा था, लेकिन भारत की राजनैतिक परस्थिति इसकी इजाज़त नहीं देती थी. लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में ये नाटक अचानक से काफी ट्रेंड करने लगा. बड़ी तादाद में लोग इसे देखने और पसन्द करने लगे. उसी दरमियान मैंने भी इसका पहला सीज़न पूरा देख लिया.

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पूरा कहना शायद सही नहीं होगा क्योंकि काफ़ी ऐसे सीन थे कि जिनके आते ही मैं तुरन्त बढ़ा देता था, मसलन आर्तग़ाल और उसकी माशूका की बातचीत, घोड़ों का दौड़ना, जंग के अकसर सीन वग़ैरह. मेरी ज़्यादा दिलचस्पी इब्ने अरबी की बातों में और ईसाइयों के नुक़्ते नज़र पर थी.

उस समय भी लिखना चाहता था लेकिन कुछ दोस्तों के कहने पर फिर इस ख़्याल को मुल्तवी कर दिया लेकिन इधर हागिया सोफिया को अलोकतांत्रिक तारीख़े से और अतातुर्क के हुस्ने ख़्याल को रुसवा व पामाल कर जिस तरह से उसे मस्जिद बनाया गया और कुछ ऐसे शऊरमंद लोगों से इस सीरियल की तारीफ़ सुन कि जिनसे इसकी उम्मीद नहीं कर सकता था, मैं मजबूर हुआ इस पर अपने ख़्यालात ज़ाहिर करने को. क्योंकि अब ख़ामोश रहना अतातुर्क के साथ फ़रेब करने में शुमार होगा और बुज़दिली कहलाएगी.

इस सीरियल पर बात करने से पहले हम ये देख लें कि इतिहास पर आधारित सीरियल या फ़िल्म में कितना इतिहास होता है या कितने की उम्मीद करनी चाहिए. मेरा मानना है कि कोई भी ऐसी कला बहुत विश्वसनीय नहीं हो सकती कि जहां कैपिटल या पूंजी का अमल दख़ल एक हद से ज़्यादा हो. फ़िल्म और सीरियल इसका बेहतरीन उदाहरण हैं.

जब इतनी पूंजी लगती है तो ज़ाहिर सी बात है कि उसकी वापसी (मुनाफ़े के साथ) की उम्मीद भी की जाती है. कोई भी निर्माता घाटा नहीं बर्दाश्त कर सकता क्योंकि ये उसका धंधा है उसकी रोटी रोज़ी. अब जहां पर पूंजी का ये प्रेशर हो वहां भला सत्ता अपना फ़ायदा क्यों न उठाना चाहेगी ! इसीलिए अक्सर फिल्मों व सीरियलों पर सत्ता का दबाव साफ़ नज़र आता है.

और जहांं बात इतिहास की हो तो सत्ता कुछ ज़्यादा ही सतर्क हो जाती है क्योंकि इतिहास हमेशा सत्ता के इशारे पर ही लिखा जाता है. इतिहास पर आधारित फिल्मों में हमें इतिहास बस उतना ही मिलता है जितना सत्ता चाहती है. हांं, ऐसी फिल्मों से हम ये ज़रूर समझ सकते हैं कि सत्ता में मौजूद ताक़त इतिहास को किस नज़रिए से देखती है और इतिहास में किन लोगों के साथ खड़ी है.

ऐसा नहीं कि इतिहास पर आधारित कोई अच्छी फ़िल्म या सीरियल बनी ही नहीं सकती. ‘भारत एक खोज’ और ‘संविधान’ जैसे सीरियल बहुत हद तक लाइक-ए-एतिबार हैं लेकिन वहां भी मौजूदा सत्ता का अमल दख़ल साफ़ देखा जा सकता है। फ़िल्म या सीरियल से इतिहास को समझना मेरी नज़र में सिवाए नादानी के और कुछ नहीं इसलिए इस सीरियल (आर्तग़ाल ग़ाज़ी) में कितना इतिहास है मेरी इसमें बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं थी बल्कि मैं ये जानना चाहता था कि इस सीरियल में इतिहास को किस नज़रिए से दिखाया गया है. क्या अतातुर्क की सोच हमें यहां नज़र आती है या नहीं ?

जहां तक इस सीरियल की बात है तो ये पूर्ण रूप से टर्की की मौजूदा सत्ता के प्रोपोगंडे का एक बेहतरीन नमूना है. बहुत सी ऐसी तसवीरें भी सामने आई हैं कि जिसमें इस सीरियल के सेट पर तुर्की के राष्ट्रपति तमाम आर्टिस्ट के साथ देखे जाते हैं.

अब यहां पर एक सवाल खड़ा होता है, वो ये कि आख़िर टर्की इस सीरियल के ज़रिए किस विचारधारा को मज़बूती देना चाहता है ? क्या वो विचारधारा अतातुर्क की ही है या कोई और ?

जब हम सीरियल देखना शुरू करते हैं तभी इस सवाल का जवाब हमें मिल जाता है. शुरू से लेकर आख़िर तक पूरे सीरियल में बस इस बात की कोशिश की गई है कि टर्की के बहुसंख्यक (मुस्लिम) के दिलों में अल्पसंख्यक (ईसाई) के प्रति नफ़रत का ज़हर भरा जाए. अफ़सोस की बात है कि इस सीरियल को भारत में सराहा गया जबकि भारत की मौजूदा परस्थिति में इस सीरियल की फ़ासिस्ट सोच को समझना सबसे आसान है.

सीरियल में बार-बार क्रूसेड का ज़िक्र होता है, ख़ैर वो एक सच्चाई है उससे इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि इसमें हम इतिहास पर नहीं बल्कि उसे दिखाने के तरीके और नज़रिए पर बात कर रहे हैं. जो लड़ाई इतिहास में दो राज्यों की बीच की थी उसे यहां पर दो मज़हबों के बीच की दिखाई गई.

पूरे सीरियल में बस यही साबित करने की कोशिश की गई कि बहुसंख्यक (मुस्लिम) कितना शरीफ़ और मासूम होता है, उससे कभी कोई ग़लती सर्ज़द हो ही नहीं सकती, हांं, एक आद ग़द्दार निकल आएं तो वो एक अलग की बात है. और अल्पसंख्यक (ईसाई) बहुत ही ज़ालिम और क्रूर होते हैं, ये पूरी दुनिया में बस अपना मज़हब फैलाना चाहते हैं, ये दुनिया से इस्लाम को उखाड़ फेंकना चाहते हैं, इनके साथ चाहे जितनी भलाई करो ये अपने ज़ुल्मों से बाज़ नहीं आएंगे.

अल्पसंख्यक के खिलाफ ऐसे दुश्प्रचार ही फासिज्म की सबसे बड़ी निशानी है. पूरे सीरियल में जब भी अल्पसंख्यकों का किला दिखाया तो इस तरह से कि मानो उस जगह पर नकारात्मक ऊर्जा भरी पड़ी हो. बंद और घुटन से भरी हुई जगह और वो हर समय ऐसे लिबास में दिखाए गए कि जिससे उनके धर्म का पता चलता हो.

दूसरा मक़सद जो नज़र आया वो पितृसत्ता को स्थापित करना. औरतों के बीच की बातचीत इसका एक बेहतरीन नमूना हैं कि जिसमें बार-बार इस पर ज़ोर दिया गया है कि तुम औरत हो, कभी कहकर तो कभी बिना कहे. इस सीरियल में बाकी टर्की सीरियल की तरह औरतों को आज़ाद नहीं रहने दिया गया है बल्कि इसका ख़ास ख़्याल रखा गया है कि उन्हें ज़्यादातर समय हिजाब में रखा जाए. हां, उस तरह का हिजाब हरगिज़ नहीं है कि जैसा हमें ईरानी या अरबी फिल्मों में देखने को मिलता है लेकिन जितना है उससे ये साफ़ ज़ाहिर है कि अब टर्किश सीरियल उधर की तरफ़ ही बढ़ रहे हैं.

इस सीरियल में एक ईसाई औरत भी दिखाई गई है कि जो अपने हुस्न के जाल में एक सीधे-साधे शरीफ़ राजा को फंंसाती है, उसे अपना जिस्म भेंट करती है और अपने घिनौने मज़हबी इरादे को पूरा करने में लगी रहती है. इस किरदार के ज़रिए औरत की बदचलनी, उसके फ़रेब को दिखाने की कोशिश की गई है जो पूरी तरीके से पितृसत्तात्मक सोच की पैदावार है.

वैसे इस सीरियल में भी इस्लामी उसूलों की पामाली भी साफ़ नज़र आती है. इस सीरियल में एक अहम किरदार है इब्ने अरबी का. इब्ने अरबी को इतिहास में फ़ादर ऑफ़ सूफ़ीज़म कहा जाता है. मैं उम्मीद कर रहा था कि टर्की तो इब्ने अरबी और रूमी की पसंदीदा सर ज़मीन रही है, वहां के लोग भी इनकी बड़ी इज़्ज़त करते हैं तो इब्ने अरबी के किरदार के साथ छेड़छाड़ न की गई होगी. लेकिन जो पिछली सदी के अतातुर्क के उसूलों को भुलाए बैठे हों उनसे इब्ने अरबी के ताल्लुक़ कुछ उम्मीद करना तो नादानी है.

यहांं फादर ऑफ़ सूफ़ीज़म को एक जादूगर बना कर पेश किया गया कि जहां भी कर्तग़ाल पर कोई मुसीबत आई कि इब्ने अरबी धम से वहां अपनी मदद पहुंंचा देते. कहीं पर भी इब्ने अरबी के ख़्यालों, उनके मैथेड को पेश नहीं किया गया. हांं, एक दो जगह पर कुछ चर्चा हुई भी तो बहुत ही ऊपरी सतह की और अक्सर इब्ने अरबी की ज़ुबान से सूफ़ीज़म को दरकिनार कर मज़हबीयात को स्थापित करने की कोशिश की गई. मज़हबीयात के भी बस उन्हीं पहलुवों पर ज़ोर दिया गया कि जिसका अगला क़दम कट्टरता ही होता है.

इन सभी चीजों को देखकर हम ये समझ सकते हैं कि इस सीरियल का मक़सद बस इतना ही था कि बहुसंख्यक के दिलों में अल्पसंख्यक के प्रति नफ़रत भरो ताकि टर्की की इस फ़ासिस्ट सरकार को और मज़बूती हासिल हो सके.

हागिया सोफ़िया को मस्जिद में बदलना कोई एक दिन का काम नहीं था. एक लंबे प्रोसेज़ से गुज़र कर यहां तक पहुंचा गया है और अब अगली मंज़िल पर पहुंचने की तैयारी हो रही है. भारत और टर्की के मौजूदा हालात एक से हैं, दोनों जगह अल्पसंख्यक के ख़िलाफ़ एक सी साजिश रची जा रही है. दोनों ही जगह फ़ासिस्ट ताकतें सत्ता में हैं इसलिए भारत के अल्पसंख्यक को चाहिए कि वो नेस्टोलजिया के शिकार होने से बचें और हक़ को पहचानने की कोशिश करें.

  • फ़रज़ाना महदी

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  1. Mustansar zaidi says:
    6 years ago

    Right n एग्री

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