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वैक्सीन लगवाना ऐच्छिक नहीं अनिवार्य ही बनाया जा रहा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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वैक्सीन लगवाना ऐच्छिक नहीं अनिवार्य ही बनाया जा रहा है

गिरीश मालवीय

भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि कोरोना का टीका लगवाना ऐच्छिक होगा यानी सरकार किसी पर वैक्सीन लेने के लिए दबाव नहीं बनाएगी और टीका लगवाना या न लगवाना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करेगा. परन्तु, अब इस टीकाकरण को अनिवार्य बनाया जा रहा है. गिरीश मालवीय की रिपोर्ट –

जैसा कि कहा था वही हो रहा है. वैक्सीन लगवाना ऐच्छिक नहीं अनिवार्य ही बनाया जा रहा है. कल इंदौर कलेक्टर ने आदेश दिया है कि सरकारी दफ्तर में जाने वाले 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को अपने साथ वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट लाना अनिवार्य होगा, तभी उन्हें सरकारी दफ्तरों में एंट्री मिलेगी. इंदौर में सरकारी कर्मचारियों को वैक्सीन लगवाना जरूरी है, अगर किसी सरकारी कर्मचारी ने वैक्सीन नहीं लगवाई तो उसे सरकारी दफ्तर में आने की अनुमति नहीं रहेगी.

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बिहार सरकार ने पुलिसकर्मियों के लिए कोरोना वैक्सीन लेना अनिवार्य कर दिया गया है. कोरोना का टीका नहीं लेने वाले पुलिसकर्मियों के वेतन पर रोक लगा दी जाएगी. बिहार में सरकार ने जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बिहार में सभी शिक्षकों का भी कोरोना टीकाकरण किया जाये. कुछ जिलों में तो यह आदेश निकाल दिए गए हैं कि अगर किसी दुकानदार के पास भीड़ अधिक है और उसने कोरोना की वैक्सीन नहीं ली है, तो उस पर कार्रवाई की जाए. इसके साथ ही दुकानदार से जुर्माना वसूला जायेगा.

छत्तीसगढ़ सरकार ने तो ‘वैक्सीन नहीं तो पेंशन नहीं’ तक की मुनादी करवाना शुरू करवा दी है. यह मुनादी होते ही लाताकोडो ग्राम पंचायत के अपात्र ग्रामीण भी वैक्सीन लगवाने के लिए पिकअप वाहन में बैठकर ब्लाक मुख्यालय पहुंच गए.

सूरत शहर ने तो और कमाल किया है. बिना वैक्सीन लिए मार्केट में प्रवेश नहीं करने का फरमान भी जारी कर दिया है. मनपा ने कहा है कि टेक्सटाइल, डायमंड यूनिट, हीरा बाजार, कॉमर्शियल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल में कार्यरत वे सभी लोग जो 45 साल से अधिक उम्र के हाईरिस्क में आते हैं, अगर उन्होंने वैक्सीन नहीं ली हो और 45 साल से कम उम्र के लोग आरटीपीसीआर या रैपिड टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट नहीं लेकर आए तो उन्हें प्रवेश नहीं दिया जाएगा. सूरत में सारे नियमों को धता बताए हुए 45 साल से कम उम्र वालों को भी वैक्सीन लगाई जा रही है.

मुंबई के माल्स में तभी प्रवेश मिलेगा जब आप वैक्सीनेशिन का सर्टिफिकेट गेट पर प्रस्तुत कर पाएंगे. यानी कुछ ही दिनों में न सिर्फ एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन बल्कि हर छोटी-छोटी जगहों पर वेक्सीन सर्टिफिकेट मांगा जाएगा, जो नही लगवाएगा उसे समाज का दुश्मन बता कर कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा. मात्र एक ही महीने में लोग भी अब इस सबके लिए मेंटली प्रिपेयर हो गये है कि हां यह सही कदम है ! ऐसा ही होना चाहिए. उन्हें इसमें कोई गलती नजर नहीं आ रही है.

हम जानते हैं कि वेक्सीन लगवा चुके लोगों के पास यह वेक्सीन सर्टिफिकेट डिजिटल फॉर्म में रहता है. उनके स्मार्ट फोन में सेव है. कल को इन्हीं लोगों को यदि कहा जाए कि देखिए स्मार्टफोन के साथ रिस्क है, कभी आप इसे लाना ही भूल जाए या इसकी बैटरी लो हो जाए तो आप क्या करेंगे ? ऐसा करते हैं कि आपकी हथेली के पीछे हम एक RFID चिप इम्प्लांट कर देते हैं, जिसमें वैक्सीनेशिन की सारी जानकारी सेव रहेंगी तो लोग इसके लिए भी खुशी-खुशी तैयार हो जाएंगे.

यानी ये तो वही हुआ न जिसके बारे में हम जैसे कई लोग आपको साल भर से बता रहे कि यह एक तरह ID2020 योजना को लागू किया जा रहा है. यह घटते हुए हम देख रहे हैं. तब भी हम जैसे लोग जो आपको इसके बारे में चेतावनी दे रहे थे उन्हें कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट बोला जा रहा है.

( 2 )

कैलाश सरण लम्बे समय से पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में कार्यरत रहे हैं और कोरोना वायरस से जुडी वैज्ञानिक खोजों पर पैनी नजर रखते आए हैं. आज उन्होंने वेक्सीन के संबंध में कमेंट लिखा है. उनके अनुसार –

दरअसल वैक्सीन जो होती है वो किसी एक इन्फेक्शस एजेंट के खिलाफ होती है, जिसकी प्रकृति में ही होता है कि इन्फेक्शस एजेंट आसानी से न बदल पाए तो उसके खिलाफ वैक्सीन प्रभावी रूप से कारगर होती है. आप स्मॉल पाक्स को ही ले लीजिए. उसके वायरस में म्यूटैशन काफी धीरे होते थे इसीलिए उसके खिलाफ बनी वैक्सीन से उसको समाप्त किया जा सका.

लेकिन वहीं अगर फ्लू की बात करे तो उसमें म्यूटैशन काफी जल्दी होते हैं और इसी कारण से आपको सलाह दी जाती है कि आपको हर साल फ्लू शॉट लगाना होंगे. जबकि उसको लगाने के बावजूद भी अमेरिका मे हर साल 75000 लोग फ्लू से काल कलवित हो जाते हैं. एचआईवी में तो म्यूटैशन इतना तेज है कि उसके खिलाफ वैक्सीन बन ही नहीं सकती बल्कि बॉडी की सेल्स को मजबूत बना उसके खिलाफ तैयारी किया जाता है.

अब बात करे कोरोना वायरस के वेक्सीनैशन की तो अभी तक पिछले साल जनवरी से इस साल 31 मार्च तक पूरी दुनिया में 4025 स्ट्रैन की पुष्टि हो चुकी है यानि रोजाना के लगभग 10 स्ट्रैन आ रहे हैं. इंडिया की बात करें तो यहां लगभग 45 स्ट्रैन की खोज हो चुकी है, जिनका संचरण अभी हो रहा है. यहां सवाल है कि जो वैक्सीन हमें लगाई जा रही है वो वैक्सीन कौन से स्ट्रैन के खिलाफ होगी ? और एक बड़ी बात, भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां 3 डबल stranded म्यूटैशन के स्ट्रैन संचरण में आ गए हैं.

बेल्जियम के स्वतंत्र वैक्सीन रिसर्चर डॉ. गीरट वांडेन बोंसचे ने कुछ दिन पहले अपने रिसर्च में यह बताया कि कैसे वेक्सीनैशन वायरस के प्रसार में काम कर रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि वेक्सीनैशन के बाद वाला व्यक्ति भी कोरोना वायरस को तेजी से शेड करता है, जिससे म्यूटैशन की गति तेज हुई है. जैसे ही उन्होंने ये रिसर्च सामने रखा तो फेसबुक ने अपने एआई सिस्टम में डाल दिया कि इनके रिसर्च का लिंक आपको पोस्ट नहीं करने देंगे. बोलेंगे ये कम्यूनिटी स्टैन्डर्ड के खिलाफ है.

( 3 )

अनिल अंबानी के बड़े बेटे अनमोल ने ट्वीट कर कहा है कि एक्टर्स, क्रिकेटर्स, राजनीतिज्ञों को अपना काम बिना किसी रोक-टोक के करने दिया जा रहा है, लेकिन कारोबार पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है. प्रोफेशनल एक्टर्स अपनी फिल्मों की शूटिंग जारी रख सकते हैं. प्रोफेशनल क्रिकेटर देर रात तक खेल सकते हैं. प्रोफेशनल राजनीतिज्ञ भारी भीड़ के साथ अपनी रैलियां कर सकते हैं. लेकिन आपका कारोबार आवश्यक सेवाओं में नहीं आता.

इंदौर की कल की खबर है कि स्वच्छता सर्वेक्षण के नाम पर कुछ दिनों पहले शहर की शाहराहो पर ठेले लगाकर जो व्यापार कर रहे थे, उन्हें हटा दिया गया और जब उन्होंने दुबारा उसी जगह पर ठेले लगाने चाहे तो लगाने नहीं दिये जा रहे. उन्होंने नगर निगम के गेट पर अपना रोजगार वापस बहाल करने को लेकर प्रदर्शन किया तो उनके खिलाफ केस दर्ज कर गिरफ्तारी के आदेश निकाल दिए गए.

अनिल अंबानी के बेटे ने अपने ट्वीट में जो एक आशंका जताई है, उस पर हमें ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि ये लॉकडाउन्स स्वास्थ्य को लेकर नहीं हैं. ये नियंत्रण करने के लिए हैं और मुझे लगता है कि हम में से कई अनजाने में बेहद बड़े और भयावह प्लान के जाल में फंस रहे हैं.

विश्व भर की सरकारें दरअसल पूरी तरह से कंट्रोल हासिल कर लेना चाहती है. पब्लिक हेल्थ तो एक बहाना है. अगर आपने कल बीबीसी पर रिलीज की गई ‘वेक्सीन पासपोर्ट’ की रिपोर्ट नही देखा है तो एक बार उसे जरूर देखिए. आपको पूरा खेल समझ में आ जाएगा कि क्या गजब तरीके से जनता को एक ट्रैप में फंसाया जा रहा है. इस रिपोर्ट ने बीबीसी जैसे निष्पक्ष समझे जाने वाले मीडिया संस्थानों के असली इरादे जाहिर कर दिए हैं. हर रिपोर्ट में दूसरा पक्ष क्या कह रहा है, इसकी जरूर बात की जाती है लेकिन रिपोर्ट के आखिरी चंद सेकंड में ब्रिटेन के सांसदों की राय बताई गयी और प्रोग्राम अचानक से खत्म कर दिया गया.

वैक्सीन पासपोर्ट को एकमात्र उपाय के रूप में पब्लिक के दिमाग मे ठूंसा जा रहा है. यहां ये कहने की कोशिश की जा रही है कि सरकारें तो लॉकडाउन लगाना नहीं चाहती लेकिन यदि आपको ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था को खोलना हैं तो वैक्सीन सर्टिफिकेट ही एकमात्र उपाय है.

विकसित देशों में यह खेल शुरू हो गया है और मोदीजी को ऊपर से चाबी भर दी गयी है कि जितना जल्दी हो वो यहां पर वैक्सीन रोल आउट के प्रोग्राम चलाए. देश के सारे कलेक्टर्स को निर्देश है कि अपने अपने जिले में जितने अधिक से अधिक लोगों को वेक्सीन लगवाए उतना अच्छा. इस बार सरकार का ध्यान बीमारी से ज्यादा वेक्सीन के रोल आउट पर है.

अच्छा एक बात बताइये कि कोई बीमारी होती है तो मार्केट में उसकी दवा पहले आती है कि वैक्सीन पहले आती है ? यह दुनिया की ऐसी पहली बीमारी है जिसकी दवा नहीं है लेकिन वेक्सीन है.

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