Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

एक कम्युनिस्ट की आत्म-स्वीकृति…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 26, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
एक कम्युनिस्ट की आत्म-स्वीकृति...
एक कम्युनिस्ट की आत्म-स्वीकृति…

लगभग 19 साल की उम्र में मैंने सामाजिक कार्यों में भागीदारी करना शुरू किया और धीरे-धीरे समाज की राजनीति समझ आने लगी. और फिर इस दुनिया में मौजूद शोषण उत्पीड़न और आगे के वर्षों में गैर बराबरी को समझने का दर्शन मिला और इस दुनिया को बदलने की राह पकड़ी, तब यह समझ आने लगा कि यह दुनिया हमेशा ऐसी नहीं थी.

जिस सामाजिक ढांचे में हम जीते हैं, जिस स्तरीकृत समाज को हम देखते हैं वह ताकतवरों की कमजोरों पर शासन करने की व्यवस्था है, जिसका सभी अनुसरण करते हैं और अगली पीढ़ी पहली पीढ़ी की रूढ़ियों और परम्पराओं को ढोती भी है और उनको अपने हितों के अनुरूप बदलती भी रहती है. ताक़तवरों की इस सत्ता को बनाये रखने के लिए राजनीतिक सत्ता के साथ ही धर्म, बिरादरी, परिवार और पुरुषप्रधानता की सत्ता औजार का काम करती है.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

मैंने जीवन का लंबा वक्त जिन लोगों के बीच में बिताया वहां पितृसत्ता को तो मैं महसूस कर पाई लेकिन जाति और धर्म के प्रश्न चूंकि कभी सतह पर नहीं उठे नहीं तो उनकी गहराई को मैं कम से कम नहीं समझ पाई. इसका कारण यह भी था कि कभी जाना ही नहीं कि मेरे साथ जो कामरेड हैं वह किस जाति और धर्म के हैं. हां, जिन परिवारों में जाते थे वहां जातिभेद समझ आता था लेकिन वहां गरीबी और उससे जुड़ा उत्पीडन ही मुख्य समस्या के रूप में दिखाई दिया.

जिंदगी के तमाम साल इस मुख्य प्रश्न के समाधान और इससे जुड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के इर्द-गिर्द बीत गए. यह जज़्बा हमेशा कायम रखा और इस बुनियादी सिद्धांत को समझा कि एक दिन मजदूर और किसान हिरावल की भूमिका निभाते हुए इस व्यवस्था को जरूर बदलेंगे. कई शहरों के समाजों को देखा, धर्म और जाति तथा क्षेत्र के विचार को जेहन में रखे बिना ख़ुद को एक इंसान माना. इस जीवन का एक ही मकसद रहा कि इस दुनिया से हर स्तर की गैर बराबरी खात्मा हो लेकिन इन तीन दिनों में मेरी ज़िन्दगी में गैर बराबरी से जुड़े कई प्रश्न उत्त्पन्न हो गए, जिसने मुझे विचलित कर दिया है.

दो दिन पहले मैं एक बुजुर्ग सज्जन के साथ मानवाधिकार आयोग गई थी. वे बड़े अधिकारी रहे हैं अब रिटायर्ड हैं. वे दलित हितों के लिए काम करते हैं और पढ़ते हैं. उन्होंने मानवाधिकार आयोग में एक अपील फ़ाइल की है कि बाजगियों को आन्दोलनकारी माना जाय (बाजगी गढ़वाल की दलित जाति से आते हैं और ढोल बजाने का काम करते हैं. इन्होंने उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान गढ़वाल के अधिकांश जगहों पर आन्दोलन व जलूसों में बिना पैसे के ढोल बजाया. चूंकि आन्दोलनकारी के जो मानदंड सरकार ने रखे उनमें ये नहीं आते हैं तो उनको आन्दोलनकारी नहीं माना गया है, अभी यह मामला विचाराधीन है.)

मैं एक एक्टिविस्ट के बतौर और इस मुद्दे को गहराई से समझने और कानूनी पहलू से मदद करने के लिए इसमें शामिल हुई लेकिन यहां पर अनजाने में ही सही मुझे मेरे जाति नाम ने असहज कर दिया. जो प्रश्न इस दौरान उन बुज़ुर्ग द्वारा मुझसे पूछे गए वो भले ही मेरे लिए सामान्य थे लेकिन उनके लिए मेरे उत्तर से संतुष्ट ना होना सामान्य नहीं था. यदि मैं यह उत्तर देती कि मेरे करीबी दोस्त मित्रों के बीच जाति और धर्म का प्रश्न कभी सामने ही नहीं आया या कि मैं कम्युनिस्ट हूं इसलिए जाति धर्म, हम नहीं मानते तो मुझे यह कहना बेईमानी लगा.

मैं गहराई से यह सोचने के लिए मजबूर हुई कि मेरे दलित साथी जो कि खून के रिश्तों से भी ज़्यादा करीब रहे हैं मेरे हर परिस्थिति में, क्या मैं उनकी उस पीड़ा को महसूस कर पाई जो दलित जाति में जन्म लेने और सवर्णों के अपमान के कारण उनको कई स्तरों पर झेलनी पड़ती है ?

अभी मैं इससे उबरने की कोशिश कर ही रही थी कि आज एक और बड़ा भ्रम चकनाचूर हो गया मेरा कि मैं नास्तिक हूं…., मैं किसी धर्म, ईश्वर, खुदा को नहीं मानती. एक नवविवाहित जोड़ा जो कि सामान धर्मी नहीं हैं, ने परिवार के विरुद्ध जाकर एक माह पहले शादी कर ली थी और आज रजिस्ट्रेशन के लिए कचहरी आए थे. धर्म के व्यापारी कई दिन से इस फिराक़ में थे कि किसी तरह इस शादी को रुकवा लिया जाए. इसके पीछे कुछ अन्य निहित स्वार्थ भी हो सकते है लेकिन यह मुद्दा तो मिल ही गया था दोनों पक्षों को.

क्षमा चाहती हूं, मैं धर्म को अफीम नहीं मानती. यह एक व्यापार है जिसमें हर स्तर पर ताकतवर सामाजिक, राजनीतिक साथ ही आर्थिक भी मुनाफा लेते हैं और कमज़ोर इस्तेमाल होता है अपने अस्तित्व और अपनी जरूरत के लिये अक्सर ही.

मैं इस प्रकरण में करीब से शामिल होना चाहती थी. भीड़ में भले ही अकेले कुछ करना संभव नहीं हो पाता तो भी देख तो लेती क्या हो रहा है. चूंकि मैंने सजी हुई दुल्हन के दृढ़ निश्चय को देख लिया था. वह अपने मायके वालों से मिली और उनमें भी बहुत गुस्सा मुझे नहीं दिखाई दिया, बस भावुक थे. लड़की को भी अपने फैसले पर कोई अफसोस नहीं दिखा. लेकिन मैं उस नादान आयशा को यह कैसे समझाती कि तुमने मुकुल के साथ रहने का जो फैसला किया है, अपने परिवार को नहीं धर्म और बिरादरी की सत्ता को चुनौती दी है, तुम्हारी चिन्ता हो रही है मुझे. लेकिन मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हुई.

मेरे सीनियर मेरे पास आए और बोले आप यहां से चले जाइए, आपके लिए दिक्कत हो सकती है. मै समझ रही थी कि यह मेरी स्थिति को देखते हुए कहा गया है, लेकिन उस पल मेरे भीतर क्या टूटा इसकी आवाज़ उन तक नहीं पहुंच पाई, यह संभव भी नहीं था. मैं वापस चेंबर में आई. कुछ देर ख़ुद को संयत किया. तभी बाहर भीड़ बढ़ने लगी. पुलिस के अधिकारी आने लगे और धीरे-धीरे मामला संवेदनशील होता चला गया.

भीड़ के बीच धार्मिक बंटवारा शुरू होने लगा. फिर से एक अन्य सहयोगी द्वारा आग्रह किया गया कि मुझे घर चले जाना चाहिए. मैं इन दो सालों में जितना सबके करीब थी अचानक आज मुझे यह सच पता लगा कि मेरे इंसान होने की महज कल्पना थी, मैं तो हिन्दू हूं … उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि यह सरासर झूठ है कि हम जाति को नहीं मानते, हम धर्म को नहीं मानते, सच यह है कि हम जिस जाति और धर्म में जन्म लेते हैं मरने तक उसका साया हमारे साथ चलता है.

मैं अपनी आंखों में आंसू और दिल में गुबार लिए ई-रिक्शा में बैठी. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरा कुछ बहुमूल्य खो गया है. मैं बदहवास हो गई, मेरे मन में उन तमाम कामरेडों, दोस्तों, मित्रों से यही संवाद करने की इच्छा तीव्र हो गई कि धर्म और जाति के यथार्थ पर हमारे बीच क्यों गंभीर चर्चाएं नहीं हुई ? क्यों इन प्रश्नों को बुनियादी नहीं माना गया ? यदि सिद्धांत में माना भी तो व्यवहार में हम इन प्रश्नों से क्यों बचते रहे ? क्या हम, जिन्होंने दुनिया बदलने का सपना संजोया अपनी सीमाओं को तोड़ पाए ?

मुझे आज अपने अज़ीज़ सिक्ख दोस्त पर भी गुस्सा आ रहा है कि 1984 के दंगों में जब वह हिंदू अतिवादियों से ट्रेन में घिर गए थे तो उन्होंने अपनी जान पर बन आने तक भी अपने बाल क्यों नहीं कटवा लिए ? क्या उन जैसे खुशनुमा दरियादिल इन्सान को समय पर उनके दोस्तों ने उनको जलते टायर से बचाकर अस्पताल नहीं पहुंचाया होता तो वह हम सबके बीच में होते ? कितने ही सवाल गडमड्ड हैं मेरे दिमाग में.

आप लोग यह सोच रहे होंगे मैं भावुकता में यह कह रही हूं. नहीं, मैं आज अपने दुःख में आपको शामिल कर रही हूं. मै आज जगदीश और गीता के लिए दुःखी नहीं हूं, ना आयशा और मुकुल के लिए और ना ही उन तमाम इंसानों के लिए जो धर्म और जाति के कारण मार दिए गए, अपमानित किए गए या हर रोज़ किसी ना किसी रूप में किए जाते हैं और हम उसको मुद्दा समझकर कुछ दिन बाद भूल जाते हैं.

मैं सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक न्याय की लड़ाई में अपना बेहतर नहीं दे पाई इसके लिए भी दुःखी नहीं हूं. मैं दुःखी हूं इसलिए कि आज मेरे इंसान होने पर प्रश्न लग गया. अब मैं इन्सान नहीं रही बल्कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई एक हिंदू स्त्री हो गई हूं !!! दोस्तों मैं इंसान ही बनी रहना चाहती हूं और इंसानियत बराबरी और वास्तविक न्याय के लिए लड़ना और बेहतर समाज को गढ़ना चाहती हूं… क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं ?

आपकी दोस्त

चंद्रकला
(सामाजिक कार्यकर्ता और देहरादून में वकील)

Read Also –

एक बुद्धिजीवी की आत्म-स्वीकारोक्ति
शोषित-पीड़ित व उसी वर्ग के बुद्धिजीवी अपनी ही मुक्ति के विचारधारा समाजवाद से घृणा क्यों करते हैं  ?
भारत में जातिवाद : एक संक्षिप्त सिंहावलोकन
भारत में जाति के सवाल पर भगत सिंह और माओवादियों का दृष्टिकोण

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

बचपन से लिंग अब तक

Next Post

चुनाव बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता : रामपुर उपचुनाव के खौफनाक संकेत

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

चुनाव बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता : रामपुर उपचुनाव के खौफनाक संकेत

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

आरएसएस सांप्रदायिकता के ज़हर और नशे को धर्म और संस्कृति के पर्दे में छिपाकर पेश करता है – हिमांशु कुमार

August 18, 2023

प्रतिशोध

March 27, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.