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बताइये ! इस लेखक से मोदी जी की जान को खतरा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 8, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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[ बताइये इस लेखक से मोदी जी की जान को खतरा है … अतः उन्हें अर्बन नक्सल कह कर गिरफ्तार किया गया है. आनंद तेलतुंबड़े का यह लेख एक बेशर्म और बेपरवाह राष्ट्र को संबोधित है. एक ऐसे राष्ट्र को संबोधित है जो अपने ऊपर थोप दी गई अमानवीय जिंदगी और हिंसक जातीय उत्पीड़नों को निर्विकार भाव से कबूल करते हुए जी रहा है. यह लेख बदायूं में दो दलित किशोरियों के बलात्कार और हत्या के मामले से शुरू होता है और राज्य व्यवस्था, पुलिस, कानून और इंसाफ दिलाने वाले निजाम तक के तहखानों में पैवस्त होते हुए उनके दलित विरोधी अपराधी चेहरे को उजागर करता है. मूलत: द हिंदू में प्रकाशित इस लेख के साथ इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में छपे उनके मासिक स्तंभ मार्जिन स्पीक का ताजा अंक भी पढ़ें. अनुवाद रेयाज उल हक ]

बताइये ! इस लेखक से मोदी जी की जान को खतरा है

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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा गांव की है. इसमें दो दलित लड़कियों की लाश पेड़ से टंगी हुई है और तमाशबीनों की एक भीड़ हैरानी से खड़ी देख रही है. यह तस्वीर हमारे राष्ट्रीय चरित्र को सबसे अच्छे तरीके से बयान करती है. हम कितना भी अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं, किसी भी हद की नाइंसाफी सह सकते हैं, और पूरे सब्र के साथ अपने आस पास के किसी भी फालतू बात को कबूल कर सकते हैं. यह कहने का कोई फायदा नहीं कि वे लड़कियां हमारी अपनी बेटियां और बहनें थीं, हम तब भी इसी तरह हैरानी और निराशा से भरे हुए उन्हें उसी तरह ताकते रहे होते, जैसी भीड़ में दिख रहे लोग ताक रहे हैं. सिर्फ पिछले दो महीनों में ही, जबकि हमने एक देश के रूप में नरेंद्र मोदी और अच्छे दिनों के उसके वादे पर अपना वक्त बरबाद किया, पूरे देश में दलित किशोरों और किशोरियों के घिनौने बलात्कारों और हत्याओं की एक बाढ़ सी आ गई.

लेकिन इस फौरन उठने वाले गुस्से से अलग, इन उत्पीड़नों के लिए सचमुच की कोई चिंता मुश्किल से ही दिखती है. शासकों को इससे कोई सरोकार नहीं है, मीडिया की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, और फिर इसको लेकर प्रगतिशील तबका उदासीन है और खुद दलितों में भी ठंडा रवैया दिख रहा है. यह शर्मनाक है कि हम दलितों के बलात्कार और हत्या को इस तरह लेते हैं कि वे हमारे सामाजिक ताना-बाने का अटूट हिस्सा हैं और फिर हम उन्हें भुला देते हैं.

मनु का फरमान नहीं हैं बलात्कार

जब भी हम जातियों की बातें करते हैं, तो हम शतुरमुर्ग की तरह एक मिथकीय अतीत की रेत में अपना सिर धंसा लेते हैं और अपने आज के वक्त से अपनी आंखें मूंद लेते हैं. हम पूरी बात को आज के वक्त से काट देते हैं, जिसमें समकालीन जातियों का ढांचा कायम है और अपना असर दिखा रहा है. यानी हम ठोस रूप से आज के बारे में बात करने की बजाए अतीत के किसी वक्त के बारे में बातें करने लगते हैं. आज जितने भी घिसे पिटे सिद्धांत चलन में हैं वे या तो यह सिखाते हैं कि चुपचाप बैठे रहो और कुछ मत करो या फिर वे जाति की पहचान का जहर भरते हैं – जो कि असल में एक आत्मघाती प्रवृत्ति है. वे हमारे शासकों को उनकी चालाकी से भरी नीतियों के अपराध से बरी कर देते हैं जिन्होंने आधुनिक समय में जातियों को जिंदा बनाए रखा है. यह सब सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया. संविधान ने अस्पृश्यता को गैरकानूनी करार दिया, लेकिन जातियों को नहीं. स्वतंत्रता के बाद शासकों ने जातियों को बनाए रखना चाहा, तो इसकी वजह यह नहीं थी कि वे सामाजिक न्याय लाना चाहते थे बल्कि वे जानते थे कि जातियों में लोगों को बांटने की क्षमता है. बराबरी कायम करने की चाहत रखने वाले एक देश में आरक्षण एक ऐसी नीति हो सकता है, जिसका इस्तेमाल असाधारण मामले में, अपवाद के रूप में किया जाए. औपनिवेशिक शासकों ने इसे इसी रूप में शुरू किया था. 1936 में, अनुसूचित जातियां ऐसा ही असाधारण समूह थीं, जिनकी पहचान अछूत होने की ठोस कसौटी के आधार पर की गई थी. लेकिन संविधान लिखे जाने के दौरान इसका दायरा बढ़ा दिया गया, जब पहले तो एक बेहद लचर कसौटी के आधार पर एक अलग अनुसूची बना कर इसको आदिवासियों तक विस्तार दिया गया और फिर बाकी उन सबको इसमें शामिल कर लिया गया, जिनकी पहचान राज्य द्वारा ‘शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों’ के रूप में की जा सकती हो. 1990 में मंडल आरक्षणों को लागू करते हुए इस बाद वाले विस्तार का इस्तेमाल हमारे शासकों ने बेहद सटीक तरीके से किया, जब उन्होंने जातिवाद के घोड़े को बेलगाम छोड़ दिया.

उनके द्वारा अपनाई गई इन और ऐसी ही दूसरी चालाकी भरी नीतियों ने उस आधुनिक शैतान को पैदा किया है जो दलितों के जातीय उत्पीड़न का सीधा जिम्मेदार है. समाजवाद की लफ्फाजी के साथ शासक वर्ग देश को व्यवस्थित रूप से पूंजीवाद की तरफ ले गया. चाहे वह हमारी पहली पंचवर्षीय योजना के रूप में बड़े पूंजीपतियों द्वारा बनाई गई बंबई योजना (बॉम्बे प्लान) को अपना कर यह दिखावा करना हो कि भारत सचमुच में समाजवादी रास्ते पर चल रहा है, या फिर सोचे समझे तरीके से किए गए आधे अधूरे भूमि सुधार हों या फिर हरित क्रांति की पूंजीवादी रणनीति को सब जगह लागू किया जाना हो, इन सभी ने भारी आबादी वाले शूद्र जाति समूहों में धनी किसानों के एक वर्ग को पैदा किया जिनकी भूमिका केंद्रीय पूंजीपतियों के देहाती सहयोगी की थी. अब तक जमींदार ऊंची जातियों से आते थे, लेकिन अब उनकी जगह इन धनी किसानों ने ले ली, और उनके हाथ में ब्राह्मणवाद की पताका थी. दूसरी तरफ, अंतरनिर्भरता बनाए रखने वाली जजमानी प्रथाओं के खत्म होने से दलित ग्रामीण सर्वहारा बनकर और अधिक असुरक्षित हो गए. वे अब धनी किसानों से मिलने वाली खेतिहर मजदूरी पर निर्भर हो गए थे. जल्दी ही इससे मजदूरी को लेकर संघर्ष पैदा हुए जिनको कुचलने के लिए सांस्कृतिक रूप से उजड्ड जातिवाद के इन नए पहरेदारों ने भारी आतंक छेड़ दिया. इस कार्रवाई के लिए उन्होंने जाति और वर्ग के एक अजीब से मेल का इस्तेमाल किया. तमिलनाडु में किल्वेनमनी में 1968 में रोंगटे खड़े कर देने वाले उत्पीड़न से शुरू हुआ यह सिलसिला आज नवउदारवाद के दौर में तेज होता गया है. जो शूद्र जोतिबा फुले के विचारों के मुताबिक दलितों (अति-शूद्रों) के संभावित सहयोगी थे, नए शासकों की चालाकी भरी नीतियों ने उन्हें दलितों का उत्पीड़क बना दिया.

उत्पीड़न को महज आंकड़ों में न देखें

‘‘हरेक घंटे दो दलितों पर हमले होते हैं, हरेक दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, दो दलितों की हत्या होती है, दो दलितों के घर जलाए जाते हैं,’ यह बात तब से लोगों का तकिया कलाम बन गई है जब 11 साल पहले हिलेरी माएल ने पहली बार नेशनल ज्योग्राफिक में इसे लिखा था. अब इन आंकड़ों में सुधार किए जाने की जरूरत है, मिसाल के लिए दलित महिलाओं के बलात्कार की दर हिलेरी के 3 से बढ़कर 4.3 हो गई है, यानी इसमें 43 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई है. यहां तक कि शेयर बाजार सूचकांकों तक में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन दलितों पर उत्पीड़न में केवल इजाफा ही होता है. लेकिन तब भी ये बात हमें शर्मिंदा करने में नाकाम रहती है. हम अपनी पहचान बन चुकी बेर्शमी और बेपरवाही को ओढ़े हुए अपने दिन गुजारते रहते हैं, कभी कभी हम कठोर कानूनों की मांग कर लेते हैं – यह जानते हुए भी कि इंसाफ देने वाले निजाम ने उत्पीड़न निरोधक अधिनियम को किस तरह नकारा बना दिया है. जबसे ये अधिनियम लागू हुआ, तब से ही जातिवादी संगठन इसे हटाने की मांग करते रहे हैं. मिसाल के लिए महाराष्ट्र में शिव सेना ने 1995 के चुनावों में इसे अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया था और महाराष्ट्र सरकार ने अधिनियम के तहत दर्ज किए गए 1100 मामले सचमुच वापस भी ले लिए थे.

दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामलों को इस अधिनियम के तहत दर्ज करने में भारी हिचक देखने को मिलती है. यहां तक कि खैरलांजी में, जिसे एक आम इंसान भी जातीय उत्पीड़न ही कहेगा, फास्ट ट्रैक अदालत को ऐसा कोई जातीय कोण नहीं मिला कि इस मामले में उत्पीड़न अधिनियम को लागू किया जा सके. खैरलांजी में एक पूरा गांव दलित परिवार को सामूहिक रूप से यातना देने, बलात्कार करने और एक महिला, उसकी बेटी और दो बेटों की हत्या में शामिल था, महिलाओं की बिना कपड़ों वाली लाशें मिली थीं जिन पर हमले के निशान थे, लेकिन इन साफ तथ्यों के बावजूद सुनवाई करने वाली अदालत ने नहीं माना कि यह कोई साजिश का मामला था या कि इसमें किसी महिला की गरिमा का हनन हुआ था. यहां तक कि उच्च न्यायालय तक ने इस घटिया राय को सुधारने के लायक नहीं समझा. उत्पीड़न के मामलों में इंसाफ का मजाक उड़ाए जाने की मिसालें तो बहुतेरी हैं. इंसाफ दिलाने का पूरा निजाम, पुलिस से लेकर जज तक खुलेआम असंगतियों से भरा हुआ है. किल्वेनमनी के पहले मामले में ही, जहां 42 दलित मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धनी जमींदार, जिनके पास कारें तक हैं, ऐसा जुर्म नहीं कर सकते और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया. रही पुलिस तो उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा. ज्यादातर पुलिसकर्मी तो वर्दी वाले अपराधी हैं. वे उत्पीड़न के हरेक मामले में दलितों के खिलाफ काम करते हैं. चाहे वो खामियों से भरी हुई जांच हो और/या आधे-अधूरे तरीके से की गई पैरवी हो, संदेह का दायरा अदालतों के इर्द गिर्द भी बनता है जिन्होंने मक्कारी से भरे फैसलों का एक सिलसिला ही बना रखा है. हाल में, पटना उच्च न्यायालय ने अपने यहां चल रहे दलितों के जनसंहार के मामलों में एक के बाद एक रणवीर सेना के सभी अपराधियों को बरी करके दुनिया को हैरान कर दिया. हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भी बदनाम सुंदुर मामले में यही किया, जिसमें निचली अदालतों ने सभी दोषियों को रिहा कर दिया था.

अपराधियों का हौसला बढ़ाया जाता है

इंसाफ देने वाले निजाम द्वारा कायम की गई इस परिपाटी ने अपराधियों का हौसला ही बढ़ाया है कि वे दलितों के खिलाफ किसी भी तरह का उत्पीड़न कर सकते हैं. वे जानते हैं कि उनको कभी सजा नहीं मिलेगी. पहले तो वे यह देखते हैं कि जो दलित अपने अस्तित्व के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं, वे यों भी उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. इस तरह उत्पीड़न के अनेक मामले तो कभी सामने तक नहीं आ पाते हैं, जिनमें से ज्यादातर दूर दराज के देहाती इलाकों में होते हैं. और अगर किसी तरह उत्पीड़न का कोई मामला दबाया नहीं जा सका, तो असली अपराधी तो पुलिस की गिरफ्त से बाहर ही रहते हैं और न्यायिक प्रक्रिया के लपेटे में उनके छुटभैए मातहत आते हैं. पुलिस बहुत कारीगरी से काम करती है जिसमें वह जानबूझ कर जांच में खामियां छोड़ देती है, मामले की पैरवी के लिए किसी नाकाबिल वकील को लगाया जाता है और आखिर में एक पक्षपात से भरे फैसले के साथ मामला बड़े बेआबरू तरीके से खत्म होता है. यह पूरी प्रक्रिया अपराधियों को काफी हौसला देती है.

क्या भगाना के उन बलात्कारियों के दुस्साहस का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिन्होंने 13 से 18 साल की चार दलित किशोरियों का क्रूरता से पूरी रात सामूहिक बलात्कार किया और फिर पड़ोस के राज्य में ले जाकर उन्हें झाड़ियों में फेंक आए और इसके बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ रफा दफा हो जाएगा ॽ जो लड़कियां अपने अपमान को चुनौती देते हुए राजधानी में अपने परिजनों के साथ महीने भर से इंसाफ की मांग करते हुए बैठी हैं और कोई उनकी खबर तक नहीं ले रहा है, क्या इसकी कल्पना की जा सकती है कि यह सब उन्हें कितना दर्द पहुंचा रहा होगा ॽ क्या हम देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके के छुपे हुए जातिवाद की कल्पना कर सकते हैं, जिसने एक गैर दलित लड़की के बलात्कार और हत्या पर राष्ट्रव्यापी गुस्से की लहर पैदा कर दी थी, उसे निर्भया नाम दिया था, लेकिन वो भगाना की इन लड़कियों की पुकार पर चुप्पी साधे हुए हैॽ महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के खरडा गांव के 17 साल के दलित स्कूली लड़के नितिन को जब दिनदहाड़े पीट-पीट कर मारा जा रहा था – सिर्फ इसलिए कि उसने एक ऐसी लड़की से बात करने का साहस किया था जो एक प्रभुत्वशाली जाति से आती है – तो क्या उस लड़के और उसके गरीब मां-बाप की तकलीफों की कल्पना की जा सकती है, जिनका वह इकलौता बेटा थाॽ और क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन दो बेगुनाह लड़कियों पर क्या गुजरी होगी, जिनके साथ अपराधियों ने रात भर बलात्कार किया और फिर पेड़ पर लटका कर मरने के लिए छोड़ दियाॽ और मामले यहीं खत्म नहीं होते. पिछले दो महीनों में इन दोनों राज्यों में उत्पीड़न के ऐसे ही अनगिनत मामले हुए, लेकिन उन्हें मीडिया में जगह नहीं मिली. क्या यह कल्पना की जा सकती है कि अपराधी बिना राजनेताओं की हिमायत के ऐसे घिनौने अपराध कर सकते हैंॽ इन सभी मामलों में राजनीतिक दिग्गज अपराधियों का बचाव करने के लिए आगे आए: हरियाणा में कांग्रेस के दिग्गजों ने, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दिग्गजों ने और महाराष्ट्र में एनसीपी के दिग्गजों ने अपराधियों का बचाव किया.

अमेरिका में काले लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के जवाब में काले नौजवानों ने बंदूक उठा ली थी और गोरों को सिखा दिया था कि कैसे तमीज से पेश आया जाए. क्या जातिवादी अपराधी यह चाहते हैं कि भारत में इस मिसाल को दोहराया जाए.

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