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मोदी ने इसरो को तमाशा बना दिया

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 10, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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चन्द्रयान-2 मिशन की शुरूआत 2011 में कांग्रेस के कार्यकाल में हुई थी, जिसका प्रक्षेपण मोदी कार्यकाल-2 में किया गया. आज जब भाजपा गाय के गोबर को कोहिनूर के हीरे से भी कीमती बताने पर तुला हुआ, गोबर से कैंसर जैसी भयानक बीमारी का इलाज ढूढ़ा जा रहा है, देश के प्रधानमंत्री पद पर बिराजमान नरेन्द्र मोदी गटर के दुर्गंध से चाय बनाने जैसी बकबास परोस रहा है. न्यूटन और आईस्टीन को फर्जी बताया जा रहा है और डार्बिन को बेवकूफ बताया जा रहा है. किताब पढ़ने को देशद्रोह माना जा रहा है. यह सब भाजपा के मोदी कार्यकाल के दौरान देश भर में जोर-शोर से उठाया जा रहा है. प्रचीन कालों के अवैज्ञानिकता के सहारे विज्ञान और वैज्ञानिकों को वेबकूफ बताया जा रहा है. इसके लिए न केवल सार्वजनिक मंचों का इस्तेमाल किया जा रहा है बल्कि विज्ञान कांग्रेस जैसी अन्तर्राष्ट्रीय मंचों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

अंध-धार्मिकता के ऐसे घटाटोप अंधकार में देश का शासक इसरो जैसी स्पेस संस्थान के आड़ में अपनी छबि निखारने का हस्यास्पद कोशिश करता है. वैज्ञानिकों के वेतन में लगातार कटौती की जा रही है. स्थापित शैक्षणिक संस्थानों को लगातार बदनाम करने और उसे टैंक से उड़ाने की बात की जा रही है. फर्जी शिक्षण संस्थान खड़े किये जा रहे हैं. तमाम प्रमुख संस्थानों के प्रमुख पदों पर बेवकूफ लोगों को बिठाया जा रहा है, जो वैज्ञानिक सिद्धांतों के बजाय पंडों-पुजारियों के शरण में जा रहे हैं, ऐसे में इसरो के चन्द्रयान-2 का प्रक्षेपण और उसकी प्रतिष्ठा हासिल करने की जुगत में बेवकूफ तमाशेबाज मोदी का हस्यास्पद व्यवहार देश और विज्ञान के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. सोशल मीडिया पर पर भी इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई, जो जाहिर है मुख्य धारा की मीडिया की हास्यास्पद कूपमंडूकता से अलग सवाल खड़े करता है.

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मोदी ने इसरो को तमाशा बना दिया

गिरीश मालवीय : रात में तमाशे बाज के लिए पूरा मंच सजाया गया था. खुद इसरो प्रमुख तमाशेबाज की अगवानी के लिए इसरो मुख्यालय के गेट पर पुहंचे, और उन्हें ससम्मान सबसे ऊंचे पैवेलियन लाउन्ज में लगे सोफे पर बैठाया गया. क्लाइमेक्स का सीन था. हर चैनल पर एंकर ‘मोदी जी की जय … मोदी की जय…’ करने को आतुर बैठा हुआ था. एक से एक क्लिपिंग तैयार थी. स्क्रिप्ट राइटरों ने सलीम जावेद भी फेल हो जाए, साहेब की प्रशंसा में ऐसे डायलॉग लिख कर रखे थे, ‘मोदी जी चांद पर, मोदी जी का मून वाक’ आदि-आदि … PR देखने वाली प्रचार एजेंसियों ने पूरा मटेरियल रेडी कर रखा था. आईटी सेल के नए नए मीम भी सोशल मीडिया पर छाने को तैयार थे.

अचानक से जमी जमाई बाजी पलट गयी. इसरो प्रमुख मोदी जी के पास गए और उन्हें सूचना दी कि ‘सर, विक्रम लैंडर से सम्पर्क टूट गया है !’ मोदी जी के अरमान ठन्डे हो गए. मुंह लटका कर इसरो मुख्यालय से निकले और होटल की तरफ चल दिये.

रात गहराती जा रही थी बड़ी-बड़ी PR एजेंसियों के प्रमुख जगे हुए था और मन्त्रणा कर रहे थे कि कैसे इस स्थिति को संभाला जाए ! अचानक उनके दिमाग में एक आइडिया आया और मोदी जी को फोन लगाया गया. मोदी जी वैसे ही होटल उखड़े हुए बैठे हुए थे, फोन देखकर चिढ़ गए लेकिन जैसे ही दूसरी तरफ से आती हुई आवाज सुनी, उनके चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान आ गयी.

सुबह 7 बजे तमाशेबाज उठे, तैयार हुए, कपड़े बदले और इसरो मुख्यालय चल पड़े. गेट पर ही सारे कैमरे तैयार थे. इसरो प्रमुख सिवम को भी गेट पर बुला लिया गया. जैसे ही सिवम गेट पर मोदी जी से मिले, मोदी जी ने उन्हें जबर्दस्ती अपनी ओर खींच लिया और लगे पीठ पर हाथ फेरने. यह दृश्य अप्रत्याशित रूप से लंबा खींचा गया, इतने कि कैमरे की खचाक-खचाक की आवाज गूंजने लगी और वैज्ञानिक की भावुक कर देने वाली बाइट तैयार थी.

मोदी जी की तरफ PR एजेंसी के मालिकों ने थम्स-अप का साइन दिया और मोदी जी मुस्कराते हुए इसरो के गेट से निकल पड़े. उनका काम हो चुका था.

कृष्णकांत : एक महीने पहले इसरो के वैज्ञानिकों की तनख्वाह घटा दी गई. वैज्ञानिक नाराज हुए, गुहार लगाई कि वेतन न काटा जाए, तब उनके साथ कोई नहीं आया. वैज्ञानिकों ने अपने चेयरमैन को पत्र लिखा कि हम बहुत हैरत में हैं और दुखी हैं. लेकिन कोई गर्वीला इंडियन उनके साथ नहीं खड़ा हुआ.

यह तनख्वाह भी तब काटी गई जब वैज्ञानिक चंद्रयान लॉन्च करने की तैयारी में लगे थे. केंद्र सरकार ने लॉन्चिंग से ठीक पहले आदेश दिया कि इसरो वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को 1996 से मिल रही दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि को बंद किया जा रहा है. यह एक तरह की प्रोत्साहन अनुदान राशि थी. यह वेतनवृद्धि भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लागू हुई थी.

वैज्ञानिक दरोगा तो है नहीं कि घूस भी ले लेता है. न वह नेता है कि दो-चार अंबानी-अडानी पाल रखे हों. उसकी तनख्वाह के सिवा उसे कुछ नहीं मिलता. 23 साल से मिल रही बढ़़ी तनख्वाह को काट लिया गया.

जब चंद्रयान लॉन्च हो गया तो नेता जी अपना कैमरा और गोदी मीडिया लेकर आए, वैज्ञानिक से गले मिले, भावुक हुए और बोले कि हमें गर्व है. आपने और हमने भी दांत चियार दिया कि ‘हां जी, आप कह रहे हैं तो हमें भी गर्व है.’ नेता जी बोले कि ‘पूरा देश वैज्ञानिकों के साथ है.’ आपने फिर से खीस निपोर दी कि हां जी सब साथ हैं.

अब तक तो किसी को किसी चीज पर न गर्व था. न देश अपनी सेना और संस्थाओं के साथ था. अब तक जो पांच युद्ध लड़े गए, भारत स्पेस का महारथी बना, उसमें देश उनके साथ कहां था. वह सब देश से अलग कुछ हो रहा था. जैसे 2014 के पहले आप भारत में पैदा होने के लिए शर्मिंदा थे, वैसे हम भी शर्मिंदा थे. आपके रूप में विष्णु जी ने अवतार ले लिया. अब हम धन्य हो गए.

यह सब क्यों किया जाता है ? इसलिए क्योंकि चुनाव जीतना है. पुलवामा और बालाकोट की तरह ही इस बार चुनावी रैली में चंद्रयान का बाजार लगा दिया गया है. आप फिर से दांत चियार दीजिए कि, ‘हां जी गर्व है. वोट आपको ही देंगे. बस वैज्ञानिकों की तनख्वाह काट लेंगे और पूरा देश मिलकर इसरो पर गर्व करेंगे.’

नेता सेना से लेकर इसरो तक को चुनावी लाभ के लिए बेच दे रहा है. जिस किसान के बेटे ने वैज्ञानिक बनकर 100 से ज्यादा उपग्रह लॉन्च में योगदान दिया है, उसे घसीट कर गले लगा लिया और सब भावविभोर हो गए.

यह वैसा ही है कि एक आदमी कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काट रहा है और दूसरा मौज लेने के लिए बगल में खड़ा होकर झर्रर्र बोल रहा है. नेता ने कहा स्टैंड अप इंडिया और आप दांत चियार दिए. फिर नेता ने कहा कि फिट इंडिया और आप दांत चियार दिए. नेता ने कहा उड़ ​इंडिया और आप …

जिस पाकिस्तान को हम चार दशक पहले दो टुकड़े में तोड़कर उसके 95 हजार सैनिकों का समर्पण करवा चुके हैं, उसी पाकिस्तान में गोला फेंक कर भाग आने के लिए नेता कहता है गर्व करो और आप गर्वीले हो जाते हैं. फिर नेता कहता है कि गर्व है तो हमें वोट करो. बस आप वोट कर देते हैं.

जन्नत की हकीकत जानने के लिए इस आंकड़े पर निगाह डालते चलें. आरटीआई से पता चला है कि 2012 से 2017 के बीच इसरो से 289 वैज्ञानिक पद छोड़कर चले गए. सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र तिरुवनंतपुरम, सैटेलाइट सेंटर बेंगलुरू और स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद जैसे केंद्रों से वैज्ञानिक पद छोड़कर जा रहे हैं. सरकार सैलरी काट ले रही है लेकिन गर्व सबको है.

सुरेश चाौहान : बात असफलता की नही बात है, अंधविश्वास की है. इसरो प्रमुख मिस्टर सिवन कहीं से भी वैज्ञानिक नहीं लगता. मिशन लांच किया, ज्योतिषियों से पूछकर, मंदिरों में माथा टेक कर, पूजा-पाठ, पाखंड का सहारा लेकर, नारियल फोड़ कर. वैज्ञानिक वो होता है जो विज्ञान पर भरोसा रखे, ना कि अंधविश्वास पर.

मिशन फेल हुआ. फूट-फूट कर रो दिए. मिशन फेल होने पर कोई वैज्ञानिक रोता नहीं है, फिर से प्रयास में लग जाता है. न्यूटन ने आठवीं बार गुरुत्वाकर्षण की खोज की थी. रोए नहीं, हार नहीं मानी. एडिशन ने बार-बार प्रयोग किए, तब जाकर बल्ब बना था.

मंदिर में मत्था टेकता, रोता हुआ, अध्यात्म में लीन व्यक्ति वैज्ञानिक नहीं हो सकता. एक वैज्ञानिक में साईंटिफिक टेंपर का होना बहुत लाजमी है जो मिस्टर सिवन में बिल्कुल नहीं है. एक पाखण्डी वैज्ञानिक नही हो सकता. विज्ञान और धर्म कभी साथ नही हो सकता. एक वैज्ञानिक को सर्वप्रथम धर्म के झूठ का त्याग करना चाहिए. जो धर्म मानता है वो ज्ञानी तो कभी हो ही नहीं सकता.

सिवन जी जब चन्द्रमा को आदमी जैसा मानते हैं, भगवान मानते उनकी पूजा करते हैं तो निःसंदेह पहले उनको अपने अंदर की कमियों को दूर करना चाहिए. मैं अंधविश्वास की बात की है. सैकड़ों वैज्ञानिक काम कर रहे हो सकता हैं. हो सकता है सम्पर्क जुड़ जाए लेकिन इसमें भगवान को घुसाने की क्या जरूरत है.

 

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