Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

क्रूर संघवाद का प्रदर्शन : एक देश और हर चीज एक जैसी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 14, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

शासक वर्ग अपने तमाम अन्तरविरोध के बीच एक बात पर पूरी तरह एकजुट होती है कि देश की जनता को लूटने की नीति को किस प्रकार मजबूती से टिकाये रखा जा सकता है. सत्ता में आने की शासकों की जद्दोजहद केवल इसी कारण होती है कि वह इस लूट में अपना हिस्सा बड़ा बना सके. पी. चिदम्बरम, जो पूर्व कांग्रेसी शासन काल में देश में किसानों-मजदूरों को लूटने, उस पर गोली चलाने, किसानों-मजदूरों के प्रतिनिधियों की हत्या करने, जेल में डालने के लिए कुख्यात है, अब वह मोदी सरकार के क्रूर तानाशाही के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. उनकी यह कोशिश महज सत्ता के लूट में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने भर की ही है, इससे ज्यादा और कुछ नहीं. वाबजूद इसके शासकों के आपसी अन्तरविरोध के कारण शासकों की कमजोरी जगजाहिर होता है, जिससे कुछ हद तक जनता को सीखने और जानने का मौका मिलता है.

अपने कलंकित माथे पर चेरूकुरी राजकुमार आजाद की हत्या का कलंक लिये पी. चिदम्बरम, मोदी सरकार की क्रूर संघी नीतियों के कारण लागू की जा रही एकतंत्रीय तानाशाही लागू करने की घृणास्पद कोशिश का एक विश्लेषण किये हैं, जिसे जानना चाहिए. प्रस्तुत है पी. चिदम्बरम द्वारा लिखित लेख का –

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

क्रूर संघवाद का प्रदर्शन : एक देश और हर चीज एक जैसी

संसद के दोनों सदनों का विलंबित मानसून सत्र शुरू हो रहा है. यह सिर्फ भौतिक उपस्थिति का सत्र होगा. कुछ दिनों पूर्व राज्यसभा के सभापति ने मेरा यह सुझाव खारिज कर दिया कि जो सदस्य सशरीर मौजूद होने में असमर्थ हों, उन्हें परोक्ष रूप से उपस्थित होने की अनुमति दी जाए. यहां तक कि उपस्थिति संतोषजनक हो, तब भी माहौल अवास्तविक होगा. मुझे लगता है कि सदन ऐसे संसदीय लोकतंत्र की तरह काम करेंगे, जहां भावना अनुपस्थित होगी और आत्मा लापता. एक देश और हर चीज एक जैसी.

दोनों सदनों का मुख्य काम होगा लंबित विधेयकों तथा सत्रों के बीच के अंतराल के दौरान जारी किए गए 11 अध्यादेशों को पारित करवाना. यह समझ से परे है कि जब देश कई तरह के संकटों-आर्थिक तबाही, बढ़ती महामारी और चीन की धमकी – का सामना कर रहा है, सरकार आखिर क्यों प्रमुख क्षेत्रों में केंद्र-राज्य संबंधों को बदलने की घातक कोशिश कर रही है ? अध्यादेश प्रधानमंत्री के इस पसंदीदा सिद्धांत का हिस्सा हैं कि हर हाल में ‘एक देश और हर चीज एक जैसी’ हो. यह सिद्धांत राज्यों और केंद्र के बीच के उस सांविधानिक समझौते की जड़ को काटता है कि भारत राज्यों का संघ होगा तथा संघवाद-विधायी और कार्यकारी शक्तियों इसका बुनियादी सिद्धांत होगा.

बरसों से राज्यों ने अपनी अनेक शक्तियां केंद्र सरकार को हस्तांतरित की हैं। सारी पार्टियों ने भारत पर शासन किया है और इसके लिए सारी पार्टियों को दोषी ठहराया जा सकता है। नरेंद्र मोदी ने राज्यों की शक्तियों को हड़पने को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है और कार्यकारी कार्रवाई तथा कानून के जरिये यह हमला लगातार जारी है। जरा कुछ नए अध्यादेशों पर गौर कीजिए। बैंकिंग (नियंत्रण) अधिनियम आज सारे बैंक, कुछ गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और सारी बड़ी वित्तीय मध्यवर्ती संस्थाएं बैंकिंग (नियंत्रण) अधिनियम से नियंत्रित होती हैं. पहले से ही बोझ कम नहीं है. नियामक के रूप में रिजर्व बैंक का रिकॉर्ड मिला-जुला है : उसकी नाक के नीचे कई घोटाले हुए हैं. राज्यों के अधीन और उसकी निगरानी में जो एकमात्र महत्वपूर्ण वित्तीय मध्यवर्ती संस्था है, वह है को-ऑपरेटिव बैंक. अधिकांश राज्यों में जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और शहरी सहकारी बैंक हैं. ये जिला स्तर के सर्वोच्च बैंक हैं और ये सदस्य सहकारी बैंकों को वित्त पोषित करते हैं.

कुछ जिला केंद्रीय सहकारी बैंक तथा शहरी सहकारी बैंक का प्रदर्शन शानदार है, तो कुछ का खराब. अच्छे हों या बुरे, उन्हें नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त शक्तियां हैं. इस स्थिति को क्यों बदलना चाहिए ? मोदी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये सारे जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और शहरी सहकारी बैंकों को केंद्र के अधीन ला दिया है और रिजर्व बैंक को इसका नियामक नियुक्त किया है. सहकारी बैंक के सदस्यता ढांचे और वित्तीय ढांचे में बदलाव लाने के लिए शक्तियां वापस ले ली गई हैं, जिसके फलस्वरूप नियंत्रण तथा प्रबंधन अजनबियों और लुटेरों को हस्तांतरित हो सकता है. इस अध्यादेश के पीछे की भावना यही है कि सारी बड़ी वित्तीय मध्यवर्ती संस्थाओं को केंद्र सरकार के अधीन होना चाहिए और सारे जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों तथा शहरी सहकारी बैंकों के प्रबंधन (निर्वाचित निदेशकों) को केंद्र सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए। यह अध्यादेश राज्यों के अधिकारों का खुला अतिक्रमण है.

आवश्यक वस्तु अधिनियम

मेरा मानना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसी अधिनियम) का संबंध कमी और नियंत्रण के दौर से था. भारत में जब खाद्यान्न का सरप्लस भंडार है और उसके पास मांग के अनुरूप आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता है, वाकई इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए. फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मौसमी तंगी या बाढ़ या सूखा के समय जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले फायदा उठाते हैं इसीलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम कानून की किताब में बना हुआ है और राज्य सरकारों को कारोबार को नियंत्रित करने के पर्याप्त अधिकार देता है, जिसमें विभिन्न मध्यवर्ती संस्थाओं पर स्टॉक जमा करने की सीमाएं तय करने का अधिकार शामिल है.

यदि केंद्र सरकार कानून को और मुक्त करना चाहती थी, तो वह एक नीति पत्र वितरित करती या एक मॉडल ऐक्ट लागू करती और इसका नियंत्रण राज्यों को सौंपती लेकिन ऐसा कोई कदम मोदी सरकार के इरादों को संतुष्ट नहीं कर पाएगा. अध्यादेश के जरिये राज्य सरकारों की ‘नियंत्रण’ करने की शक्तियों में कटौती हो गई और ‘स्टॉक जमा करने की सीमा’ तय करने का अधिकार छलावा हो गया. शर्त तथा स्पष्टीकरण उपखंड के जरिये अध्यादेश ने स्टॉक सीमा की अवधारणा को छलावा और अर्थहीन कर दिया. यदि यह अध्यादेश कानून बन जाता है, तो जमाखोर जश्न मनाएंगे.

एपीएमसी एक्ट तथा अनुबंध की स्वतंत्रता

मेरा मानना है कि कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में समय-समय पर संशोधन होने चाहिए और कृषि उत्पाद का विपणन – धीरे उदार किया जाना चाहिए. इस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता आदर्श कानूनों तथा दृढ़ निश्चय से निकलता है, न कि विधायी रास्ते से. अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार ने राज्य के विधायी एपीएमसी ऐक्ट को निरस्त कर दिया है. सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कई अन्य राज्य, जिन्होंने सार्वजनिक खरीद तथा किसानों को एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) देने में भारी निवेश किया है.

आशंका इस बात की है कि मोदी सरकार शांता कुमार समिति की विवादास्पद सिफारिशों को अमल में लाने की कोशिश कर रही हैं, जिसका प्रभाव सार्वजनिक खरीद में कमी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एमएसपी सिद्धांत तथा खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा. अनुबंध की स्वतंत्रता से संबंधित इसके साथ लाया गया अध्यादेश खरीदार को उत्पाद के एवज में एमएसपी से कम का भुगतान न करने के लिए बाध्य नहीं है, जिससे संदेह हो रहा है कि एमएसपी को हटाया जा सकता है. इन अध्यादेशों के विरोध में पंजाब के किसान सड़कों पर हैं, पंजाब विधानसभा ने इन दोनों अध्यादेशों को सर्वसम्मति से खारिज किया है. अकाली दल ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।

छत्तीसगढ़ ने विधेयकों को वापस लेने की मांग की है. हरियाणा और मध्य प्रदेश बिना किसी स्पष्टीकरण के चुप्पी साधे हुए हैं. यह स्पष्ट है कि राज्य सरकारों का नजरिया कुछ भी क्यों न हो, मोदी सरकार अपने क्रूर बहुमत का उपयोग करेगी और संशोधनों को पारित करेगी और संघवाद को एक और झटका दिया जाएगा. एक राष्ट्र, हर चीज एक जैसी, का सिद्धांत अंततः एक राष्ट्र को तबाह कर देगा.

Read Also –

मोदी सरकार के तीन कृषि अध्यादेश : किसानों के गुलामी का जंजीर
भारतीय कृषि को रसातल में ले जाती मोदी सरकार
भारतीय कृषि का अर्द्ध सामन्तवाद से संबंध : एक अध्ययन
‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशप्रेम’ पर कोहराम मचाने वाले कहीं विदेशी जासूस तो नहीं ?

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

डरावना है सत्ता में बैठे लोगों का एजेंडा – न्यू पेंशन स्कीम

Next Post

यूपी में 5 साल तक संविदा नौकरी का प्रस्ताव

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

यूपी में 5 साल तक संविदा नौकरी का प्रस्ताव

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

महान गणितज्ञ लियोनार्ड ऑयलर

April 15, 2021

आतंक के असली अर्थ

January 10, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.