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नागपंचमी : भारत में सांपों की हत्या का पर्व

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 30, 2020
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नागपंचमी : भारत में सांपों की हत्या का पर्व

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

सिर्फ भारत में ही नहीं विश्‍व की लगभग सभी सभ्‍यताओं में सांपों को किसी न किसी रूप में पूजने का रिवाज रहा है. यथा –

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  • यूनानी देवता एस्‍क्‍लीपियस (जो कि औषधि के देवता माने जाते हैं) के पास मौजूद पंखों वाले दण्‍ड पर दो सांप दर्शाये गये हैं. यही नहीं यूनानी देवी एथेना (जो कि बुद्धि की देवी मानी जाती हैं) के चित्रण में भी जिस ढ़ाल का प्रयोग किया गया है, उस पर भी एक सांप उकेरा रहता है.
  • मिस्र की उर्वरता की देवी एक नागमुखी नारी के रूप में चित्रित की गयी हैं, यही नहीं मिस्र के सभी प्राचीन फेरों के मुकुट पर नाग की आकृति बनी होती थी.
  • आस्‍ट्रेलिया में अजगर की पूजा की जाती है और वहां के आदिवासी अजगरों को बहुत सम्‍मान की दृष्टि से देखते हैं. उनका मानना है कि अजगर (इन्‍द्रधनुष) में स्‍वच्‍छ जल के देवता निवास करते हैं तथा जो व्‍यक्ति नियमों को तोड़ता है, ये उसको सजा भी देते हैं.
  • अमेरिकी आदिवासियों का एक वर्ग एजटैक सांप को मानव के गुरू के रूप में मानता है. वे लोग सांपों की पूजा क्‍वेटजालकोटल के रूप में करते थे, जिसे एक अर्धमानव-अर्धईश्‍वर के रूप में माना गया है.
  • होपी रेड इण्डियन सांपों को बारिश के दूत के रूप में मानते हैं.
  • अफ्रीका के लगभग सभी आदिवासी अजगर सांपों को पूज्‍यनीय मानते हैं और उसका विशेष सम्‍मान करते हैं.
  • प्राचीन भारत में भी सांपों को पूज्य ही माना गया है और भारतीय मान्‍यता में जैनों में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के अधिष्ठायक देव धरणेन्द्र और देवी पद्मावती के रूप पूजा जाता है और उन्हें नागलोक के इंद्र और इंद्राणी माना जाता है.
  • आधुनिक भारत में कई धर्मों के मिश्रित समुदाय हिन्दुओं में तो विष्‍णु (वैष्णव समुदाय) की शय्या के रूप में शेषनाग को दर्शाया गया है तथा शिव (शैव समुदाय) में शिव के गले में नागों की माला दर्शायी जाती है.
  • पश्चिम बंगाल में मां मन्‍शा को सांपों की देवी के रूप में पूजा जाता है. इसके अलावा भी अनेकानेक समुदायों में ऐसे कई धार्मिक आख्यान मिलते है जिनमें नागों का उल्‍लेख आया है.

इस प्रकार हम यह देखते हैं कि सांपों को सम्‍पूर्ण विश्व में श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है, परंतु प्राचीन सभ्यताओं में कहीं भी दूध पिलाने की परम्परा दिखायी नहीं देती और आज भी भारत के अलावा कहीं भी सांपों को दूध पिलाने की परंपरा नहीं है (भारत में भी यह परम्परा सिर्फ हिन्दुओं में है, जैनों में नहीं है), लेकिन हिन्दुओं में ये परम्परा कैसे पड़ी और एक सालाना दिवस के रूप में नागपंचमी कैसे ख्यात हुआ, ये शोध का विषय है.

बहरहाल, भारत में नागपंचमी के दिन सांपों की विशेष रूप से ‘पूजा’ की जाती है और चूंंकि हिन्दू धर्म की मान्यतानुसार सांपों को दूध पिलाने से देवता प्रसन्न होते हैं इसलिये हिन्दू मतावलम्बियों द्वारा इस दिन सांपों को दूध पिलाने की परम्‍परा भी लगभग सारे भारत वर्ष में चल रही है, जबकि असल में सांपों को दूध पिलाने से उनकी जान पर बन आती है और जाने-अनजाने रूप से हिन्दू मतावलम्बी नागपंचमी के रूप में सांपों की हत्या कर इसे हत्या के पर्व के रूप में परिवर्तित कर देते हैं क्योंकि जीवविज्ञान नाग को दूध पिलाने के मत को स्वीकार नहीं करता है.

जंतुओं के स्वभाव एवं उनके गुणों पर काम करने वाले विशेषज्ञ, डॉक्टर्स और खुद सपेरे भी स्वीकार करते हैं कि सांप का शरीर इस प्रकार का नहीं होता है कि वह दूध पी सके. और अगर सांप ने दूध पी लिया तो उनकी आंतों में इंफेक्शन हो जाता है और वह जल्दी ही वह मर जाते हैं. और ऐसा सिर्फ दूध पिलाने से ही नहीं बल्कि उन्हें दूध या पानी से नहलाने और उन पर पुष्प चढाने से भी होता है और इस बात को समझने के लिये सांप की प्रकृति को समझना पड़ेगा यथा –

शायद आप यह तो जानते ही होंगे कि सांप एक सरीस़ृप (रैप्‍टीलिया) है और सभी सरीसृप प्राणी शीत-रूधिर (Cold blooded) या असमतापी (Incommensurable) प्राणी होते हैं अर्थात ये प्राणी अपने शरीर के तापमान को स्थिर नहीं रख पाते हैं और वातावरण के अनुसार उनका आंतरिक तापमान बदलता रहता है इसीलिये सभी सरीसृप प्राणी समुद्र सहित धरती के लगभग प्रत्‍येक हिस्‍से में पाये जाने के बावजूद अंटार्कटिका अथवा ध्रुवीय महासगरों में उनके अत्याधिक ठन्डे होने के कारण से नहीं पाये जाते हैं क्योंकि वहां पर इनका शरीर अपने लिये ऊष्‍मा पैदा नहीं कर सकता इसलिये वहां इनका जीवन सम्‍भव नहीं होता.

और ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सरीसृपों के शरीर पर बाल अथवा पंख आदि नहीं पाये जाते हैं बल्कि इनके स्‍थान पर उनके शरीर पर शल्‍क होते हैं, जो उनके शरीर की नमी को बाहर जाने से रोकते हैं. इसीलिये सभी सरीसृप वर्ग में, विशेषकर सांपों के शरीर को अतिरिक्‍त पानी या नमी की आवश्‍यकता नहीं होती है.

जितना इनके शरीर को नमी या पानी की जरूरत होती है उसकी पूर्ति ये अपने शिकार के शरीर में मौजूद पानी से कर लेते हैं इसीलिये दूध या कोई भी तरल पदार्थ पीना सांप की प्रकृति नहीं होती. इसीलिये प्राकृतिक रूप से सांप कभी भी दूध नहीं पीते हैं. वैसे भी दूध पीना स्‍तनधारियों का लक्षण है सरीसृपों का नहीं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि नागपंचमी के दिन जो सपेरे सांप लेकर घूमते हैं वे सांप कैसे दूध पी लेते हैं ?
इसका सीधा-सा जवाब यह है कि नागपंचमी के दिन जो सांप दूध पीते हुए दिखते हैं उन्‍हें 15-20 दिनों से भूखा-प्‍यासा रखा गया होता है. और ऐसे में जब भूखे सांप के सामने दूध आता है तो वह अपनी भूख मिटाने के लिये विवशता में दूध को गटक लेता है लेकिन सांप को दूध पिलाना मतलब उसे मौत के मुंह में धकेलना है.

भूख की वजह से वो विवश सांप मजबूरन दूध को गटक तो लेता है लेकिन उसे हजम नहीं कर पाता और दूध उसके फेफड़ों पर असर डालता है, जिससे उसके शरीर में इंफेक्शन फैलने लगता है और तापमान स्थिर रखने की प्रक्रिया में उसके शरीर में जो दबाव बनता है, उससे कुछ ही समय में उसके फेफड़े फट जाते हैं और सांप की मृत्यु हो जाती है.

उस पर दूध या पानी डालकर नहलाने से या पुष्पों की नमी से भी ठीक ऐसा ही परिणाम होता है क्योंकि असल में इस नमी से उसका तापमान गिर जाता है, जिसे स्थिर करने की उसकी कोशिश इंफेक्शन होने की वजह से नाकाम हो जाती है और वो मर जाता है.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि कोई भी व्‍यक्ति जो किसी भी बहाने से सांप को दूध पिला रहा है या पूजा के रूप में उसके शरीर में नमी पहुंचा रहा है, वह न तो देवताओं को प्रसन्न कर रहा है और न ही कोई पुण्‍य का काम कर रहा है बल्कि एक जीव की मृत्यु का कारक बन महापाप कर रहा है. ऐसी कुप्रथाओं के कारण से ही सपेरों को अवैध रूप से सांपों को पकड़ने और प्रताड़ित करने के लिये प्रेरित होना पड़ता है.

जीवविज्ञान के प्रोफेसर के मुताबिक सांप पूरी तरह से मांसाहारी होता है और चूहे, कीड़े-मकोड़े, मछलियां आदि खाता है, अतः दूध उसके लिये जहर समान है.

अतः यदि आपको वास्‍तव में सांपों के प्रति श्रद्धा है तो उसके सच्चे हितैषी बने और उन्‍हें दूध न पिलाये और संपेरों के पास से उन्हें मुक्‍त करवाकर उनके प्राकृतिक आवास जंगलों तक पहुंचाने की कोशिश करे. और सच मानिये, ऐसा करके आप वास्‍तव में पुण्‍य का काम करेंगे और एक अच्‍छे इंसान ही नहीं जीवप्रेमी के रूप में भी जाने जायेंगे.

आयुर्वेद के हिसाब से भी सांप सिर्फ वे चीजें ग्रहण करते हैं जो न अम्लीय और न ही क्षारीय हों लेकिन साथ ही मध्य या समानुपाती भी न हो. इसीलिये सांप सर्वभक्षी (सभी जीवों को खाने वाला) नहीं होता. कच्चा दूध क्षारीय और गर्म किया हुआ दूध बीच की की प्रकृति का होता है. ऐसे में जब सांप दूध पीता है तो उसकी आंतों में संक्रमण हो जाता है और दूध की मात्रा ज्यादा पी लेने पर उसकी तुरंत मौत भी हो जायेगी, इसलिये सपेरे उसे उसकी भूख के अनुरूप दूध पीने नहीं देते बल्कि थोड़ा-सा दूध पीने पर कटोरा हटवा देते हैं ताकि वो ज्यादा देर जिन्दा रहे और ज्यादा लोगों के कटोरे से दूध पीये, जिससे उसे ज्यादा धन मिले !

राष्ट्रीय स्तर पर सांपों का शो करने वाले भंवर बावरा ने भी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि सांप में सुनने की क्षमता नहीं होती लेकिन उसकी जीभ और आंंखें बड़ी तीव्र होती है. अतः उनसे वो सूक्ष्म से सूक्ष्म स्पंदन/तरंग को महसूस कर लेता है और इसीलिये सिर्फ बीन से निकली तरंगों को महसूस करके बीन के साथ डोलता है (नाचता नहीं है).

जब उनसे सांप के दूध पीने बाबत सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि सांप कभी दूध नहीं पीता लेकिन भूखे के सामने जो रखोगे वो उसे खा-पी लेगा. सो सांप दूध पी लेता लेकिन उसके बाद वो 48 घण्टे के अंदर-अंदर मर जायेगा क्योंकि ये उसके हिसाब से सूटेबल नहीं है. आगे के एक जवाब में उन्होंने इस परंपरा को पूरी तरह भ्रांति और फर्जी बताया था. तो जो लोग भी सांपों को दूध पिलाते हैं वे आज से प्रण करे कि नागपंचमी रूपी अन्धविश्वास में शरीक होकर आप सांपों को दूध पिलाकर उनकी हत्या का पर्व नहीं मनायेंगे !

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