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एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम : भाजपा और आरएसएस दोनों की पेशानी पर आ गया पसीना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 10, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अदालतों में अपराध सिद्ध नहीं होते, तत्काल गिरफ्तारी से ही संतोष करने को मजबूर थे दलित.अब वो अधिकार भी उनके हाथ से सुप्रीम कोर्ट ने छीन लिया. 2 अप्रैल को स्वतःस्फूर्त सड़कों पर उतरे विभिन्न दलित व प्रगतिशील संगठनों के युवाओं के एक साथ सड़क पर उतरने से सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के पांंवों के नीचे से जमीन खिसक गयी है.

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पार्टी संगठन और सरकार में उसके सूबेदारों ने आनन-फानन में 20 मार्च की अपनी करतूतों पर पर्दा डालने की योजना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पलटवाने के प्रयास शुरू हो गये. पर समस्या थी कि बेंच खुद अपने ताजा फैसले को पलटे कैसे ? सो उसने फैसला न बदलने पर दस दिन बाद मामले से जुड़े सभी पक्षों को सुनने की बात कर अगली तारीख दे दी. बाबा साहब के 127वें जन्मदिन समारोह से पहले सम्भव है, मामले में कोई नाटकीय मोड़ आ जाए.

क्या ये महज इत्तेफाक है कि दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने और इस्तेमाल करने के जिस अधिकार को दिलाने के लिए 20 मार्च, 1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाद गांंव में बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर ने सत्याग्रह शुरू किया था, उसके ठीक 90 वर्ष बाद उसी 20 मार्च को भारत सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत में अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत अपराध दर्ज होते ही आरोपी को गिरफ्तार करने के प्रावधानों को शिथिल करने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी ?

क्या ये सरकार का दुमुंंहापन नहींं कहा जायेगा कि एक तरफ तो उसका मुखिया, बाबा साहब को सबसे ज्यादा “मान” देने की बात के लिए अपनी छाती ठोंकता है और दूसरी तरफ देश के सर्वोच्च न्यायालय में उसी के कारिंदे बाबा साहब के अनुयायियों के हितों पर चोट करने वाली याचिका पर अपनी स्वीकृति देने में तनिक भी संकोच नहीं करते ?

उस समाज के हितों पर चोट, जिससे सम्बन्धित लाखों मामले न्यायालयों में सालों साल निर्णयों की आश में  लिए लंबित रहते हैं और वे उनसे तौबा करते हुए कहते हैंं – “हमारे पास गुजर-बसर करने, खाने, पहनने, बच्चों और परिवार की परिवरिश करने तक के पैसे नहींं हैं, ऊपर से ये मुक़दमें ! कृपया हमें इन मुकदमों से मुक्त करिए, हमें हमारे हाल पर छोड़िये.” देश के 700 जिलों में से मात्र 194 जिलोंं में एससी/एसटी एक्ट की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन हो पाया है.

नेशनल क्राइम रिकोर्ड ब्यूरो की वर्तमान में उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2016 में अनुसूचित जाति के 1 लाख 44 हजार से ज्यादा और अनुसूचित जनजातियों के 23,408 मामले न्यायालयों के सामने परीक्षण के लिए पहुंचे. इनमें अनुसूचित जातियों के मात्र 14,400 के लगभग मामले ही निबटाये जा सके और इन में भी मात्र 3,600 के लगभग मामले में ही आरोपियों को सजा हो पायी, शेष बरी हो गए. अनुसूचित जनजातियों के 2800 के लगभग ही मामले निर्णित हुए. उनमें से मात्र 560 मामलों में ही सजा सुनाई गयी, शेष बरी हो गये. अदालतों में मामलों के निर्णित हो पाने की ये दीन-हीन दशा इस बात का सबूत है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को सामाजिक न्याय दिलाने की पूरी व्यवस्था ही मजाक बन कर रह गयी है.

यह क़ानून भारत के हर उस व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहींं है परन्तु इस वर्ग के लोगों पर अत्याचार करता है. देश के कुल 29 राज्यों में 707 जिले हैं. इनमें से मात्र 14 राज्यों ने ही अपने यहाँ एससी/एसटी एक्ट के तहत विशेष अदालतों का गठन किया है. इन 14 राज्यों (आंध्र प्रदेश और तेलंगाना -13/12, बिहार-38/33, छत्तीसगढ़-27/9, गुजरात-33/11, झारखंड-24/1, कर्नाटक-30/6, केरल-14/3, मध्यप्रदेश-51/17, महाराष्ट्र-36/27, ओड़िसा-30/19, तमिलनाडु-32/28, राजस्थान-33/18, उत्तर प्रदेश-75/20) के कुल 436 जिलों में से केवल 204 जिलों में इन विशेष न्यायालयों का गठन किया गया है. यानि इन राज्यों ने अपने यहांं के हर जिले में ऐसे विशेष अदालतों का गठन किया ही नहीं है. भारत के कुल 707 जिलों में से 204 जिलों में ही एससी/एसटी एक्ट के तहत विशेष न्यायालयों का गठन किया है. यानि दो तिहाई भारत के थानों में दर्ज मुकदमों में जांच पूरी होने के बाद उनकी सुनवाई के लिए विशेष अदालतें हैं ही नहीं. इन क्षेत्रों के अनुसूचित जाति/ जनजाति वर्ग के लोगों को अपने साथ होने वाले अत्याचारों के मुकदमों की सुनवाई, नियमित जिला न्यायालयों में ही होती है; जहांं पहले से मुकदमों के पहाड़ खड़े हैं.

अदालतों तक पहुंंचने से पहले न जाने कितने मामलों का गला पुलिस ही घोंट देती है. इस सम्बन्ध में नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो की साईट पर कोई डाटा मौजूद नहीं है. चूंकि नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो को डाटा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के गृहमंत्रालय की है, जिसे प्रत्येक राज्य से ये डाटा लेना चाहिए, पर इस जिम्मेदारी का कडाई से पालन क्यों नहीं हो रहा ? किसकी जिम्मेदारी है ? देश जानना चाह रहा है.

क्या सरकार “स्वतःस्फूर्त दलित” युवाओं के सड़कों पर उतरने से इतना सहम और ठिठक गयी है कि सैकड़ों वर्षों से उच्च जातियों द्वारा आर्थिक लाभ के अवसरों से वंचित और सामाजिक रूप से प्रताड़ित और अपमानित किये जाते रहने के फलस्वरूप उनके खोये हुए स्वाभिमान से जुड़े मुद्दों पर गंभीर होकर, उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल हो पाने की राह में खड़े हर रोड़े को हटाने और कांंटों को दूर करने के ईमानदार प्रयास करेगी ?

2 अप्रैल के स्वतःस्फूर्त भारत बंद में तमाम दलित संगठनों के शामिल होने के सोशल मीडिया पर किया गए आह्वान की भाषा, केवल हिंदी न होकर सभी भारतीय भाषाओं में होती तो इस आन्दोलन की व्यापकता दलित आन्दोलनों के इतिहास में रिकॉर्ड बन सकती थी.

इस आन्दोलन के दौरान जो हिंसक घटनाएं हुई और 11 लोगों की जानें गयी और करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो गयी, उन्हें कारित करने में अति उत्साहित दलित युवा हैं या आन्दोलन की छबि बिगाड़ने के पीछे कोई और है ? ये गहन और ईमानदार जांच का विषय है. कई जगह दूसरे दिन भी दलितों की सम्पत्ति, घर, दुकान आदि को नुकसान पहुंचाने के प्रयासों के बाद शक तो पैदा होता है.

मोदी सरकार को प्रचंड बहुमत के साथ पदस्थापित करने में दलितों के योगदान को भाजपा चाहकर भी नकार नहीं सकती. भाजपा जानती है कि दलितों में चुनावी परिणामों को बदलने की ताकत काफी अहम् है. भाजपा में इस आशंका को लेकर जबर्दस्त बेचैनी है कि अगर हिंंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़, जहांं भाजपा सत्ता में है और इसी वर्ष उसे चुनावों का सामना करना है, में दलित खिलाफ हो जाएं तो इन राज्यों में न सिर्फ सत्ता का पासा पलट सकता है, बल्कि 2019 की राह में अनेकोंं दुश्वारियांं भी खड़ी हो सकती है.

मध्य प्रदेश के कुल सीट 230, आरक्षित क्षेत्र 35 में 28 पर, राजस्थान के कुल सीट 200, आरक्षित क्षेत्र 33 में 31 पर, छत्तीसगढ़ के कुल सीट 224, आरक्षित क्षेत्र 10 में 9 पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा है. अब एक निगाह डालते हैंं 2009 के मुकाबले 2014 के लोकसभा में हासिल सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत की बढ़त पर. लोकसभा में कुल सीटों की संख्या 545, कुल आरक्षित क्षेत्र 84, इसमें 79 अनुसूचित जाति, 5 अनुसूचित जनजाति, अभी केवल अनुसूचित जाति की सीटें ही लक्षित हैं. 2009 के मुकाबले 2014 में भाजपा का कब्जा 12 से बढ़ कर 40 पर हो गया (यहांं उल्लेखनीय है कि इन 40 सीटों में 17 सांसद अकेले उत्तर प्रदेश से जीत कर आये हैं) और वोट प्रतिशत भी 12 प्रतिशत से बढ़ कर 24 प्रतिशत हो गया. पाठक समझ सकते हैं, ऊंची जातियों के साथ-साथ अनुसूचित जाति वर्ग का साथ कितना सम्वेदनशील और अहम् मसला है भाजपा के लिए. सबसे बड़ी दिक्कत जो भाजपा के सामने पेश है वो है- दलित और उच्च जातियों, यानी दो परस्पर विरोधी सामाजिक मानसिकताओं को साथ ले के चलने की मजबूरी. ये मजबूरी भाजपा की स्थिति को कितना दयनीय और विषम बना देती हैं, यह देखने-समझने लायक है.

2  अप्रैल के भारत बंद के दौरान दलित युवा पर हमलावर पुलिस

भाजपा ने कभी कांंग्रेस को दलित और मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों के ग्रहण से मुक्त नहीं होने दिया. कांग्रेस खुद को, “हिन्दू मानसिकता” वाली उच्च जातियों के दिल-ओ-दिमाग में गहरे घर कर गए (पुरानी पीढ़ी के उदार ब्राह्मणों को छोड़ कर) इन लांछनों की कालिमा को, कभी धो नहीं पायी. भाजपा ने अपने इसी प्रछन्न राजनैतिक दर्शन को उभार कर अनुसूचित जातियों के साथ-साथ वृहद हिन्दू समाज पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली.

तमिलनाडू में पत्ताली मक्काल काच्ची जिसे स्थानीय ऊंची जाति, वन्नियार के अधिसंख्य लोगों का समर्थन प्राप्त है, देश के अन्य हिस्सों में बसने वाले अन्य ऊंची जाति के लोगों की तरह वर्षों से अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून में बदलाव/ढील देने सरीखी मांग करती रही है. बीजेपी के दलित वर्ग से सांसद उदित राज भी मानते हैं कि इस क़ानून का दुरूपयोग होता है, पर बहुत से अन्य कानूनों का भी दुरूपयोग होता है, सुप्रीम कोर्ट उन कानूनों के बारे में भी ऐसी ही राय  क्यों नही देती? 

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के स्टडी ऑफ़ सोशल सिस्टम सेंटर के एक प्रोफ़ेसर विवेक कुमार बताते हैं कि “दुरूपयोग के उलट एक सच्चाई यह है कि अनुसूचित जाती-जनजाति अत्याचार निवारण कानून का पालन पूरी तरह से नहींं होता है. इसका सबूत रिहाई की उच्च दर है. वर्ष 1992 के बहुचर्चित भंवरी देवी मामला जो राजस्थान से है, में अदालत ने ऊंची जाति के बलात्कारियों को यह कह कर बरी कर दिया कि लड़के अपने पिता के सामने ऐसा नहींं कर सकते.”

अखबारों-पत्रिकाओं में अन्य विद्वानों के बयान कि दुरूपयोग की बात बहुत बढ़ा-चढ़ा कर की जा रही है, भी अहम् है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीज के निदेशक संघमित्र शील के एक पत्रिका में छपे बयान कि “पीड़ितों की सामाजिक पृष्ठभूमि उन अधिकारियों से अलग होती है, जो दलितों के खिलाफ अपनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों के साथ काम करते हैं. ज्यादातर मामलों में पीड़ित अपने ऊपर अत्याचार करने वालों के मातहत होते हैं. छोटी हैसियत होने के कारण शिकायत दर्ज कराना भी मुश्किल होता है. कई तरह के दबाव और मजबूरियां भी मामलों की वापसी के पीछे होती हैं. इसलिए अक्सर रिहाई इस वजह से ही नहीं होती कि अपराध हुआ ही नहींं, बल्कि इस वजह से भी होती है कि शिकायत करने वाले की मुकदमा लड़ने की सामाजिक-आर्थिक हैंसियत जबाब दे जाती है.”

दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर के पत्र-पत्रिकाओं में छपे बयानों के मुताबिक़ –“इस क़ानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या से उत्पीड़न के मामलों की वास्तविक संख्या का अंदाजा नहीं लगता क्योंकि पुलिस अक्सर एफआईआर दर्ज ही नहीं करती. अन्ततः यह क़ानून उतना ही कारगर है जितनी पुलिस और न्यायपालिका. दोनों ही एससी-एसटी एक्ट के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं.”

भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए अवसर की समानता, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समानता का उल्लेख भारतीय संविधान की प्रस्तावना में है. जब आरक्षण की व्यवस्था पर संविधान सभा में बहस हो रही थी तब गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था कि – “ब्रिटिश कर्मचारी तन्त्र में भारतीयों का प्रतिनिधित्व न होने के कारण समाज कुंठित हो रहा है. इसलिए समाज के सभी लोगों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, नैतिकता के आधार पर उनकी क्षमताओं का उपयोग करने के लिए उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए. आम्बेडकर के मन में उसी समय यह विचार कौंध गया कि जब डेढ़ सौ बरस पुरानी अंग्रेजी शासन व्यवस्था में प्रतिनिधित्व न मिल पाने के कारण भारतीय सवर्ण अपनी क्षमताओं का उपयोग न कर पाने के कारण दु:खी हैं तो हज़ारों साल से अपनी क्षमताओं का उपयोग न कर पाने के कारण दलित कितने दुखी होंगे ? इसी पृृष्ठभूमि में अंबेडकर ने संंविधान सभा में दलितों को आरक्षण देने की मांग उठाई, ताकि उनका प्रतिनिधित्व हो सके और वे अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकें.

इसी आधार पर अनुसूचित जाति-जनजातियों के लिए साढ़े बाईस प्रतिशत आरक्षण स्वीकार किया गया. आरक्षण का आधार गरीबी उन्मूलन नहीं है. उनका आधार सामजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन दूर करना है. प्रतिनिधित्व और आर्थिक पिछड़ापन दो अलग अलग बातें हैं. आर्थिक पिछड़ापन सभी जातियों में है इसलिए आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए अलग से योजनायें बनायी जाती रही है.

एक अरसा, बिहार चुनाव के ऐन पहले, सामने आये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत के बयान कि “आरक्षण की समीक्षा की जायेगी” और उसके बाद भी समय बे-समय सरकारी निर्णयों जैसे पदोन्नति में आरक्षण समाप्ति, उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण नीति में हुए बदलावों जैसी सरकारी नीतियों, सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों में भारी मात्रा में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों का न किया जाना, तमाम सरकारी प्रतिष्ठानों में खाली पड़े पदों पर कर्मचारियों के चयन की परम्परागत व्यवस्था की जगह ठेका प्रथा के माध्यम से कर्माचारियों की आपूर्ति करने जैसे कई कदम ऐसे उठाये गए; जो भले ही सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ को घटाने के लिए उठाए गए हों, पर इन कदमों ने दलित युवाओं के सामने सुरसा की मानिंद मुंंह बाए खड़ी बेरोजगारी की समस्या का सरकार द्वारा कोई कारगर समाधान न करने और पिछले दरवाजे से आरक्षण ख़त्म करने की अपनी छबि बना ली है, जिसकी परिणति सरकार के प्रति दलित युवाओं के 2 अप्रैल को स्वतःस्फूर्त आन्दोलन में हुई समझी जा रही है.

भले अब भाजपा दलित बाहुल्य बस्तियों में अपने सांसदों को एक नहीं दो रात बिताने या वहीं बस जाने के निर्णय लेंं, बाबा साहब का 127वां जन्मदिन कितने ही भव्य तरीके से मनाने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा ले पर दलित युवा इसे सरकारी “ढोंग” से ज्यादा मानने को तैयार दिखता प्रतीत नहीं हो रहा.

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2018/04/VID-20180406-WA0028.mp4

2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने और झूठे मुकदमे दर्ज करने के लिए गाडियों को खुद तोड़ती पुलिस का सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो

जुलाई 2016 में गौ-रक्षकों द्वारा गुजरात के ऊना में दलितों की निर्मम पिटाई के बाद एक ओर तो दलित चेतना को उभारा वहींं दूसरी ओर जिग्नेश मेवानी को गुजरात के दलित नेता के रूप में स्थापित कर दिया. मेवाणी आज गुजरात विधान सभा में दलित आवाज हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में मई 2017 में कथित तौर पर हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक नवजात दलित संगठन “भीम आर्मी” के संस्थापक चन्द्रशेखर उर्फ़ “रावण” को भी दलित राजनीति में स्थापित कर दिया. गिरफ्तारी के बाद इलाहबाद हाई कोर्ट ने उन पर लगाए गए आरोपों को राजनीति से प्रेरित मानते हुए जमानत दे दी परन्तु उत्तर प्रदेश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) लगा दिया, फलस्वरूप वे अभी तक जेल से रिहा नहींं हो पाए हैंं.

इसी वर्ष एक जनवरी को कोरेगांव-भीमा में ब्रिटिश सेना की “महार रेजिमेंट” द्वारा पेशवा मराठा सेना को परास्त करने की स्मृति में महाराष्ट्र के दलित प्रतिवर्ष एक जनवरी को शौर्य दिवस मनाते हैं. इस साल उसकी 200वीं वर्षगांंठ के अवसर पर भारी हिंसा हुई. 300 लोगों को हिरासत में लिया गया और अनुमान है कि इस हिंसा में 700 करोड़ की सम्पत्ति का नुकसान हुआ. यह आन्दोलन भी दलित स्वाभिमान की चाहत को और मजबूती प्रदान कर गया.

दलितों की प्रताड़नाओं, सार्वजनिक अपमान की घटनाऐं तो अनगिनत हैंं, उन्हें समेटना एक लेख की परिधि में असम्भव है, पर हर घटना के बाद दलित और ज्यादा संगठित ही हुए हैंं.

सरकार के प्रति दलितों की नाराजगी ने भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को रोक लिया है. दलित वर्ग के लोग अब भाजपा और उसके वैचारिक लाईट हाउस दोनों के आये दिन एक कदम आगे दो कदम पीछे की चालबाजी से हलकान हैं. वर्ष 2018 और 2019 का शुरूआती अर्ध-वर्ष उस “रौब और हेंकड़ी” से व्यतीत होता नहींं लग रहा है जिस “रौब और हेंकड़ी” को उसने 2014 में दलितों को साथ लेकर कायम की थी.

-विनय ओसवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक मामलों के जानकार

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