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पत्रकारिता की पहली शर्त है तलवार की धार पर चलना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 4, 2019
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पत्रकारिता की पहली शर्त है तलवार की धार पर चलना

पुण्य प्रसून वाजपेयी
सवाल सिर्फ बैंक फ्रॉड भर का नहीं है. सवाल तो ये है कि बैंक से नीरव मोदी, मेहुल चौकसी और माल्या की तर्ज पर कर्ज लेकर ना लौटाने वालों की तादाद की है और अरबों रुपया बैंक का बैलेंस शीट से हटाने का है और सरकार का बैंकों को कर्ज का अरबों रुपया राइट आफ करने के लिये सहयोग देने का है. यानी सरकार बैंकिंग प्रणाली के उस चेहरे को स्वीकार चुकी है, जिसमें अरबों रुपये का कर्जदार पैसे ना लौटाये. तो ऐसे में बैंकों की उस फेरहिस्त को पढ़िये कि किस बैंक को कितने का चूना लगा और कर्ज ना लौटाने वाले हैं कितने.

किसी भी मीडिया हाउस के लिये ये उपलब्धि हो सकती है कि उसके उद्घाटन में प्रधानमंत्री आ जाए. ठीक वैसे ही जैसे 31 मार्च, 2019 को दिल्ली में एक न्यूज चैनल के उद्घाटन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहुंच गये . एतराज किसी को होना ही चाहिये क्योंकि न्यूज चैनल की शुरुआत ही अगर देश के सबसे बड़े ब्रांड की मौजूदगी के साथ हो रही है तो फिर बात ही क्या है. लेकिन इसका ये अर्थ भी कतई नहीं होना चाहिये कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी में पत्रकारिता करना भूल जाया जाये. और वह भी तब जब देश लोकसभा चुनाव की तरफ बढ़ चुका होगी. नोटिफिकेशन जारी हो चुका है. 10 दिन बाद पहले चरण की वोटिंग हो  दरअसल पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने के समान है और यही चूक बार-बार मीडियाकर्मियों से हो रही है. ऐसे मौके पर पत्रकारिता का मिजाज क्या कहता है ?

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ये सवाल कोई भी कर सकता है. खासकर जो पत्रकार इस दौर में समझ नहीं पा रह हैं कि सत्ता के करीब रहा जाये या सत्ता से दूर. पत्रकारिता करने के लिये सत्ता से करीब या दूर होना कोई मायने नहीं रखता है बल्कि पत्रकारिता तो तथ्यों के साथ सत्ता पर भी निगरानी रखती है और सत्ता को राह भी दिखाती है कि वह गलत बयानी कर बच नहीं सकती. यानी सवाल ये नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कांन्फ्रेस नहीं करते हैं या फिर न्यूज चैनलों में एकतरफा भाषण देकर चले जाते हैं. सवाल है कि प्रधानमंत्री मोदी बतौर पालिटिशन अपनी पोजिशनिंग करते हैं. लेकिन मीडिया खुद की पोजेशनिंग बतौर पत्रकार क्यों नहीं कर पाता. यानी पीएम ने जो कहा वह सच है भी नहीं, ये तो मीडिया बता ही सकता है यानी रीयल टेस्ट प्रधानमंत्री के भाषण के बाद होना चाहिये.




कोई चैनल अगर शुरु ही प्रधानमंत्री के भाषण से हो रहा है तो फिर अगला कार्यक्रम ना सही लेकिन शाम के प्राईम टाइम में तथ्यों के साथ चैनल को ये बताने की समझ तो होनी चाहिये कि प्राधानमंत्री जो कह गये वह कितना सही है. क्योंकि देश में जब सत्ताधारी राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि कैबिनेट स्तर के मंत्री और खुद प्रधानमंत्री भी कोई भी आंकड़े रखकर अपने छाती ठोकते हुये चले जाते हैं तो फिर सवाल ये नहीं कि सत्ता ने गलत क्यों बोला, सवाल ये है कि पत्रकार ने सच या सही क्यों नहीं बताया.

तो न्यूज चैनल के उद्घाटन में पीएम मोदी ने अपने भाषण में कालेधन पर नकेल कसने का जिक्र किया. बैंकिंग प्रणाली को कितना मजबूत किया है, इसका विस्तार से जिक्र किया. और यहीं से सवाल उठा कि प्रधानमंत्री जो भी कह गये क्या उस पर सवाल नहीं उठना चाहिये. मोदी बोले कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पीएम बनने से तीन साल पहले से कह रखा था कि कालेधन पर एसआईटी बनाइये. लेकिन मनमोहन सरकार ने नहीं बनाया और सत्ता में आते ही पहली कैबिनेट में उन्होंने एसआईटी बनाने का निर्णय ले लिया. जबकि हकीकत ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2011 से  कालेधन को लेकर मनमोहन सत्ता क्या कर रही है, इसका जवाब मांगा था .और साफ तौर पर कहा था कि विदेशों में कितना कालाधन है इसका कोई आंकड़ा बताने की स्थिति में सरकार कब आ पायगी. और तब के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि जब तक दुनिया के तमाम देशों के साथ ये समझौता नहीं हो जाता है कि वहां के बैंकों में जमा भारतीय नागरिकों के कालेधन की जानकारी दें तब तक मुश्किल है. और समझना होगा कि एसआईटी बनाने का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2014 में किया.




बाकायदा आरटीआई एक्ट के तहत एसआईटी को बनाने के लिये कहा. और तब मनमोहन सरकार को लगा कि देश में चुनाव होने वाले हैं तो फिर चुनाव के बाद जिसकी सरकार बनेगी, वह एसआईटी बनाये तो बेहतर होगा. और 27 मई, 2014 को मोदी ने अपनी पहली कैबनेट में एसआईटी बनाने का ऐलान कर दिया यानी सवाल तीन साल का नहीं था. लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा सच जो पीएम मोदी हमेशा छुपा लेते है कि एसआईटी तो आरटीआई कानून के तहत बना है, तो सारी जानकारी जनता को मिलनी चाहिये और इसी प्रक्रिया में एसआईटी बनने के बाद 28 अक्तूबर, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा मोदी सत्ता को निर्देश दिया कि ’24 घंटे के भीतर वह बताये कि विदेशी बैंकों में किन भारतीयों का कालाधन जमा है.’ और हालात देखिये, उसके बाद साढ़े चार बरस बीत गये लेकिन आज तक मोदी सत्ता ने उन नामों का खुलासा नहीं किया जिनका कालाधन विदेशी बैको में जमा है तो क्या कालेधन पर पीएम के बयान से ही एक रिपोर्ट तथ्यों के साथ दिखायी नहीं जानी चाहिये ?

खैर, अपने भाषण में पीएम मोदी सबसे ज्यादा बैंकों को लेकर बोले कि कैसे उन्होंने पांच बरस के भीतर डूबती बैंकिंग प्रणाली को ठीक कर दिया. तो क्या न्यूज चैनल का काम सिर्फ मोदी का भाषण अपने मंच से दिलवाना भर ही होना चाहिये या फिर चैनल को इससे सुनहरा अवसर नहीं मिलता कि उनके मंच पर आकर पीएम कुछ भी कहकर नहीं जा सकते. यानी शाम के प्राइम टाइम में तो बाकायदा पांच बरस में कैसे बैंकों का बंटाधार हुआ है, इसको लेकर घंटे भर का कार्यक्रम तक बनाया जा सकता है. और खबर का पेग पीएम का भाषण ही है. क्योंकि ये पहली बार हुआ कि बैंकों में जमा जनता की कमाई की रकम की लूट को छुपाने के लिये मोदी सत्ता ही सक्रिय हो गई.




हालात इतने बुरे हो गये कि सत्ता में आने के बाद बरस दर बरस बैंकों की फाइल साफ सुथरी दिखायी दे उसके लिये सिलसिलेवार तरीके से लूट की रकम को रिटेन आफ किया गया, जबकि रिकवरी ना के बराबर हुई. मसलन 2014-15 में 49,018 करोड़ रिटेन आफ किया गया और रिकवरी हुई सिर्फ 5461 करोड़. 2015-16 में रिटेन ऑफ किया गया 57,585 करोड़ और रिकवरी की गई महज 8096 करोड़. 2016-17 में रिटेन आफ किया गया 81,683 करोड़ और रिकवरी हुई 8680 करोड़. 2017-18 में रिटेन आफ किया गया 84,272 करोड़ रुपये और रिकवरी हुई महज 7,106 करोड़ रुपये. यानी पहले चार बरस में बैंकों की फाइलों में कर्ज लेकर लूट लिये गये 2,72,558 करोड रुपये नजर ना आये, इसकी व्यवस्था की गई. जबकि बैंकों की सक्रियता इन चार बरस में रिकवरी कर पायी सिर्फ 29,343 करोड़ रुपये.

तो फिर बैंकों में कैसे सुधार मोदी सत्ता के दौर में आ गया ? क्योंकि अनूठा सच तो ये भी है कि करीब 90 फीसदी एनपीए रिटेन आफ कर दिया गया. और अगर बैंकों के जरिये हालात को समझें तो 2014 से 2018 के बीच यूको बैंक ने कोई रकवरी की ही नहीं जबकि कर्ज दे दिया 6087 करोड़, जिसे मोदी सरकार ने रिटेन आफ कर दिया. देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक आफ इंडिया ने इन चार बरस में कर्ज की रिकवरी की सिर्फ 10,396 करोड़ और जो रिकवरी नहीं हो पायी वह रकम है 1,02,587 करोड़ रुपये और इस रकम को बैंकों की फाइलों से रिटेन ऑफ कर दिया. और ये बाकायदा रिजर्व बैंक के जरिये जारी की गई 21 बैंकों की सूची है, जो साफ-साफ बताती है कि आखिर जो एनपीए 2014 में सवा दो लाख करोड़ का था वह 2019 में बढ़ते-बढते 12 लाख करोड़ भी पार कर चुका है और एनपीए का बढ़ना महज इंटरेस्ट रेट नहीं होता है बल्कि इस दौर में कर्ज देकर लूट को बढ़ाने की सिलसिला भी कैसे सिस्टम का हिस्सा हो गया.




और लूट को रोकने का जो दावा प्रधानमंत्री चैनल के उद्घाटन भाषण में कर गये उस पर तो चैनल को अलग से रिपोर्ट तैयार कर बताना चाहिये कि कैसे बीते पांच बरस के दौर में बैंक फ्राड के मामले हवाई गति से बढ़े हैं. जरा इसके सिलसिले को परखें एसबीआई [2466], बैंक आफ बड़ौदा [782] ,बैंक आफ इंडिया [579], सिंडीकेट बैंक [552],सेन्ट्रल बैंक आफ इंडिया [527], पीएनबी [471], यूनियन बैंक आफ इंडिया [368], इंडियन ओवरसीज बैंक[342],केनरा बैंक [327], ओरियंट बैंक आफ कामर्स[297] , आईडीबीआई [ 292 ], कारपोरेशन बैंक[ 291], इंडियन बैंक [ 261], यूको बैंक [ 231], यूनाईटेड बैंक आफ इंडिया [ 225 ], बैंक आफ महाराष्ट्र [ 170], आंध्र बैंक [ 160 ], इलाहबाद बैंक [ 130 ], विजया बैंक [114], देना बैंक [105], पंजाब एंड सिंध बैंक [58] … ये बैंकों में हुये फ्रॉड की लिस्ट है. 2015 से 2017 के दौरान बैंक फ्रॉड की ये सूची साफ तौर पर बतलाती है कि कमोवेश हर बैंक में फ्रॉड हुआ. सबसे ज्यादा स्टेट बैंक में 2466 तो पीएनबी में 471 और सभी को जोड़ दीजियेगा तो कुल 8748 बैंक फ्रॉड बीते तीन बरस में हुआ, यानी हर दिन बैंक फ्रॉड के 8 मामले देश में होते रहे.

पर सवाल सिर्फ बैंक फ्रॉड भर का नहीं है. सवाल तो ये है कि बैंक से नीरव मोदी, मेहुल चौकसी और माल्या की तर्ज पर कर्ज लेकर ना लौटाने वालों की तादाद की है और अरबों रुपया बैंक का बैलेंस शीट से हटाने का है और सरकार का बैंकों को कर्ज का अरबों रुपया राइट आफ करने के लिये सहयोग देने का है. यानी सरकार बैंकिंग प्रणाली के उस चेहरे को स्वीकार चुकी है, जिसमें अरबों रुपये का कर्जदार पैसे ना लौटाये. क्योंकि क्रेडिट इनफारमेशन ब्यूरो आफ इंडिया लिमिटेड यानी सिबिल के मुताबिक इससे 1,11,738 करोड़ का चूना बैंकों को लग चुका है. और 9339 कर्जदार ऐसे हैं जो कर्ज लौटा सकते हैं, पर इंकार कर दिया. और पिछले बरस सुप्रीम कोर्ट ने जब इन डिफाल्टरों का नाम पूछा तो रिजर्व बैंक की तरफ से कहा गया कि जिन्होंने 500 करोड़ से ज्यादा का कर्ज लिया है और नहीं लौटा रहे हैं, उनके नाम सार्वजनिक करना ठीक नहीं होगा. अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. तो ऐसे में बैंकों की उस फेरहिस्त को पढ़िये कि किस बैंक को कितने का चूना लगा और कर्ज ना लौटाने वाले हैं कितने.




तो एसबीआई को सबसे ज्यादा 27716 करोड़ का चूना लगाने में 1665 कर्जदार हैं. पीएनबी को 12574 करोड का चूना लगा है और कर्ज लेने वालों की तादाद 1018 है. इसी तर्ज पर बैंक आफ इंडिया को 6104 करोड़ का चूना 314 कर्जदारों ने लगाया. बैंक आफ बड़ौदा को 5342 करोड़ का चूना 243 कर्जदारों ने लगाया. यूनियन बैंक को 4802 करोड़ का चूना 779 कर्जदारों ने लगाया. सेन्ट्रल बैंक को 4429 करोड़ का चूना 666 कर्जदारों ने लगाया. ओरियन्ट बैंक को 4244 करोड़ का चूना 420 कर्जदारों ने लगाया. यूको बैंक को 4100 करोड़ का चूना 338 कर्जदारों ने लगाया.

आंध्र बैंक को 3927 करोड़ का चूना 373 कर्जदारों ने लगाया. केनरा बैंक को 3691 करोड़ का चूना 473 कर्जदारों ने लगाया. आईडीबीआई को 3659 करोड़ का चूना 83 कर्जदारों ने लगाया. और विजया बैंक को 3152 करोड़ का चूना 112 कर्जदारों ने लगाया. तो ये सिर्फ 12 बैंक हैं जिन्होंने जानकारी दी कि 9339 कर्जदार हैं जो 1,11,738 करोड़ नहीं लौटा रहे हैं. फिर भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई नहीं है उल्टे सरकार बैंकों को मदद कर रही है कि वह अपनी बैलेंस शीट से अरबों रुपये की कर्जदारी को ही हटा दें.

जाहिर है पीएम को उद्घाटन में बुलाकर चैनल में अपनी धाक जमा ली लेकिन पीएम के कथन के पीछे के सच को अगर चैनल दिखाने की हिम्मत रखता तो वह वाकई भारतवर्ष कहलाता अन्यथा रायसीना हिल्स और लुटियन्स की दिल्ली में बसे चमके इंडिया की कहानी तो रेड कारपेट है, जिस पर चलते हुये दिखने का शौक अब हर मीडियाकर्मी को हो चला है.

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)




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