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Home गेस्ट ब्लॉग

पुलिस बर्बरता पर मीडिया की चुप्पी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 23, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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पुलिस बर्बरता पर मीडिया की चुप्पी

Ravish Kumarरविश कुमार, मैग्सेस अवार्ड प्राप्त जनपत्रकार

बहुत सारे वीडियो आए हैं, जिनमें पुलिस की बर्बरता दर्ज हुई है. वह एकतरफ़ा तरीक़े से लोगों के घरों में घुसकर मार रही है. कोई अकेला पुलिस से घिरा हुआ है और उस पर चारों तरफ़ से लाठियां बरसाई जा रही है. एक वीडियो में लोग एक दूसरे पर गिरे पड़े हैं और उन पर पुलिस बेरहमी से लाठियां बरसाती जा रही है. जब कोई पकड़े जाने की स्थिति में हैं तो उसे मारने का क्या मतलब ? जब कोई घर में है और वहां हिंसा नहीं कर रहा है तो फिर घर में मारने का क्या मतलब ? ज़ाहिर है पुलिस की दिलचस्पी आम गरीब लोगों को मारने में ज़्यादा है. उसके पास किसी को भी उपद्रवी बताकर पीटने का लाइसेंस है.

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कई सारे वीडियो में पुलिस बदला लेती दिख रही है. वह आस पास की संपत्तियों को नुक़सान पहुंचा रही है। वहां खड़ी मोटरसाइकिल को तोड़ रही है. दुकानें तोड़ रही है. पत्थर चला रही है. वहां तो चला ही रही है, जहां उस पर पत्थर चले हैं लेकिन वहां भी चलाते दिख रही है, जहां सामने कोई नहीं है और पुलिस पत्थर मारे जा रही है. इसका कोई आंकलन नहीं है कि पुलिस की हिंसा और तोड़फोड़ से कितने का नुक़सान हुआ है ? सिर्फ़ जामिया से ख़बर आई है कि ढाई करोड़ की संपत्ति का नुक़सान हुआ है. यूनिवर्सिटी के भीतर तो शांति थी, लाइब्रेरी में तो हिंसा नहीं हो रही थी ? क्या योगी आदित्यनाथ या अमित शाह ऐसे मामलों में भी पुलिस की संपत्ति नीलाम कर लोगों को हर्जाना देंगे ?

यूपी में सात लोग गोली से मरे हैं. पुलिस आराम से कह देती है कि उसने गोली नहीं चलाई तो फिर वहां पर मौजूद वह क्या कर रही थी ? उसके पास भी तो कैमरे होते हैं वही बता दें कि गोली कहां से और कैसे चल रही थी ? जामिया मिल्लिया की हिंसा में तीन गोलियां चली हैं. पहले पुलिस ने यह बात नहीं बताई जब एनडीटीवी ने इस ख़बर को दिखाया तब कई तरह की थ्योरी दी गई. जब पुलिस घिरने लगी तो कहा गया कि लोगों ने चलाएं और उनके पास देसी कट्टे थे. सोचिए ऐसा होता तो पुलिस पहले ही दिन नहीं बताती ? अपनी हिंसा के समर्थन में उसके पास इससे दमदार प्रमाण क्या हो सकता था ? फिर जब वीडियो आया जिसमें पुलिस ही गोली चलाते दिख रही है कि पुलिस और मीडिया चुप्पी मार गया. ज़ाहिर है मीडिया पुलिस की हिंसा को लेकर ज़्यादा सहनशील है. उसकी दिलचस्पी लोकतंत्र में होती तो इन सवालों को प्रमुख बनाती.

हर बार यह कहना कि बाहरी लोगों ने हिंसा की पुलिस के जवाब पर शक पैदा करता है. क्या पुलिस की इस हिंसा को नहीं दिखाया जाना चाहिए ? ऐसे अनेक वीडियो वायरल हो रहे हैं मगर मीडिया को दिखाने के डर से वायरल हो जा रहा है. हर जगह से पुलिस की हिंसा से जुड़े प्रश्नों और वीडियो को साफ़ कर दिया गया है. चैनलों पर सिर्फ़ लोगों की हिंसा के विजुअल हैं या ख़बरों की पट्टी में सही लिखा है कि भीड़ ने हिंसा की.

मैं यह नहीं कह रहा कि लोग हिंसा नहीं करते हैं, वो हिंसा की स्थिति पैदा नहीं करते हैं. बिल्कुल करते हैं. इस मामले में लोग भी दूध के धुले नहीं है लेकिन हिंसा के हर मामले में या ज़्यादातर मामले में पुलिस की हिंसा कम दिखाई जाती है.

जो भी है कुछ प्रदर्शनों में कुछ लोगों को बेलगाम होते देखा जा सकता है. उनके बीच से पत्थर चलाए जा रहे हैं. ऐसे लोग अपनी उत्तेजना से माहौल को तनावपूर्ण बना रहे हैं. वो अपनी गली में पत्थर चला कर दूसरे शहरों के प्रदर्शनो को कमजोर करते हैं. लोगों की उत्तेजना से पुलिस को कुछ भयंकर होने की आशंका में सतर्क और अतिसक्रिय होने का मौक़ा मिलता है. एक वीडियो अहमदाबाद का आया है. लोगों ने पुलिस को ही दबोच लिया है. पुलिस पर हिंसा कर रहे हैं, मगर उसी भीड़ से सात नौजवान निकल कर आते हैं और पुलिस को बचाते भी हैं. इस वीडियो की खूब चर्चा हुई. वायरल जगत और मीडिया दोनों में लेकिन जिस वीडियो में कई सारे पुलिस वाले एक आदमी पर ताबड़तोड़ लाठियां बरसा रहे हैं उस पर चर्चा नहीं.

दरियागंज से दो वीडियो घूम रहे हैं. उसमें पुलिस के लोग छत पर ईंटें तोड़ते देखे जा सकते हैं. एक वीडियो रात का है जिसमें गली में किसी को घेर कर मार रहे हैं. वो चीख रहा है फिर भी मारे जा रहे हैं जबकि अगर वो हिंसा का आरोपी था तो आराम से पुलिस बिना मारे पकड़ कर ले जा सकती थी. मंगलौर से ऐसे कुछ वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें पुलिस की बर्बरता साफ़ दिख रही है. जब सामने से हमला हो तो पुलिस की कार्रवाई समझ आती है लेकिन जब कोई जवाबी हमला न हो तब गलियों और दुकानों में घुसकर क़हर बरपाने का तुक सिर्फ़ और सिर्फ़ लोगों को औकात में रखना है.

एक और वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें पुलिस वाले डंडे से कार के शीशे तोड़ रहे हैं. वहां लोग नहीं हैं. लोगों की कार खड़ी है और पुलिस तोड़ते जा रही है. क्या वह किसी और के मोहल्ले में ऐसा करती ? यही दिल्ली पुलिस है जो चुपचाप तीस हज़ारी कोर्ट से चली आई. वकीलों ने तो कथित रूप से लॉकअप में आग लगा दी थी. पुलिस वालों को मारा था तब क्या आपने देखा था कि दिल्ली पुलिस उनके घरों और कमरों से खोज कर ला रही है ? उनकी गाड़ियाँ तोड़ रही है ? तो क्या हम दिल्ली पुलिस का सांप्रदायिक चेहरा देख रहे हैं ?

जो भी है पुलिस को हिंसा की छूट है. आत्मरक्षा के नाम पर उसकी हिंसा को सही मान लिया जाता है. वीडियो देखे तों लगता है कि पुलिस मारने की तैयारी में ही आई है. कई वीडियो में पुलिस गालियाँ देती दिख रही है. लोगों को सांप्रदायिक बातें कह रही हैं. जामिया में लड़कियों को जिन्ना का पिल्ला कहा गया. बीजेपी के एक नेता कहते हैं कि दवा डालने पर कीड़े-मकोड़े बिलबिला कर बाहर आ रहे हैं. यह समझ लेना चाहिए कि जिन लोगों का सत्ता पर नियंत्रण हैं, उनकी भाषा ऐसी है तो पुलिस को ऐसी भाषा बोलने की छूट मिलेगी ही.

तो क्या प्रदर्शनों को हिंसा के हवाले करना ठीक होगा ? मेरी राय में इससे सनक भरा फ़ैसला नहीं हो सकता. हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा. इससे पीछे हटना ही होगा. लोगों को भी सीखना होगा कि जब प्रदर्शन में जाएँ तो उनका आचरण कैसा हो. भाषा कैसी हो. वरना पुलिस तैयार बैठी है. अच्छी बात है कि कई जगहों पर पुलिस ने शानदार काम किया. लोगों को प्रदर्शन करने दिया और लोगों ने भी ढंग से प्रदर्शन किया. यही कारण है कि ज़्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं. इसके लिए लोग और पुलिस दोनों बधाई के पात्र हैं.

नागरिकता रजिस्टर और क़ानून का विरोध प्रदर्शन नेता विहीन है इसलिए हिंसा से बचाना लोगों की ही ज़िम्मेदारी है. जान-माल का नुक़सान ठीक नहीं है. हिंसा होने पर किसी को कोई इंसाफ़ नहीं होता है. केवल बहस होती है. लोगों को समझना चाहिए क़ानून बन चुका है. NRC आएगी. तो यह मामला एक दिन का नहीं है. जो लोग इसके विरोध में उनके धीरज और हौसला का इम्तहान है. एक दिन के लिए दौड़ लगाकर आ जाना आसान होता है. सरकार भी इंतज़ार में है कि दो चार दिनों में थक जाएँगे या फिर इतने लोग पुलिस की गोली से मार दिए जाएँगे कि प्रदर्शन का मक़सद ही समाप्त हो जाएगा. हिंसा मत होने दीजिए. न कीजिए और न करने दीजिए.

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