Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

हिडमा की विरासत अब खत्म नहीं होगी. हिडमा का इतिहास कभी नहीं मिटेगा…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 26, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
(पिछले चार-पांच दिनों से हिडमा और राजे के बारे में तमाम मीडिया में ढेरों रिपोर्ट्स आ रही हैं. कुछ ताकतवर शासक वर्ग की प्रोपेगैंडा स्टोरीज़ हैं, कुछ काल्पनिक, कुछ आधी-अधूरी जानकारी वाली, और कुछ हिडमा के चरित्र हनन के लिए नफ़रत भरी प्रोपेगैंडा… इन सबके बीच, सच्चाई का विश्लेषण करने वाली स्टोरीज़ कहीं कम ही मिलती हैं, ख़ासकर सोशल मीडिया पर. हिडमा की वीरता, उनके सम्मान, आदर और उनके प्रति शोक की कहानियां सोशल मीडिया पर ही व्यक्त हो रही है. इन्हीं सब के बीच, मैंने व्हाट्सएप पर एक ऐसा लेख देखा जो हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी और हिडमा के व्यक्तित्व को समझने का मुख्य स्रोत बन गया है, और मैं उसे आपके साथ साझा किए बिना नहीं रह सका. इसके साथ ही, मैं हिडमा और राजे की प्रेम कहानी पर नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट की तस्वीर भी साझा करना चाहता था – सम्पादक

जनता द्वारा बनाया गया एक योद्धा – समिता द्वारा लिखित

हिडमा की विरासत अब खत्म नहीं होगी. हिडमा का इतिहास कभी नहीं मिटेगा...
हिडमा की विरासत अब खत्म नहीं होगी. हिडमा का इतिहास कभी नहीं मिटेगा…

जब संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति देने वालों को याद करने की बात आती है, तो आमतौर पर कहा जाता है – ‘कहीं जन्मे, कहीं पले, कहीं गए और अपना जीवन दे दिया’ – ऐसे ही गीत होते हैं, ऐसे ही गुणगान होते हैं. लेकिन हिडमा के मामले में, मामला बिल्कुल अलग है. वह वहीं पैदा हुआ था. वह वहीं पला-बढ़ा. उसने संघर्ष किया और वहीं इतिहास रचा. अंततः, वह उसी मिट्टी में समा गया. उस आदिम बस्तर की मिट्टी में. आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट क्षेत्र के श्रीकाकुलम में जन्मे नंबाला केशव ने भी छह महीने पहले इसी बस्तर की धरती पर अपना रक्त बहाया था… और बस्तर का एक बच्चा माडवी हिडमा ने 18 नवंबर, 2025 को पूर्वी घाट के मारेदुमल्ली क्षेत्र में अपना जीवन खो दिया. केवल छह महीनों में, भारत के जनयुद्ध ने दो सक्षम सेनापतियों को शहीद कर दिया.

हिडमा को जानने से पहले, उस बस्तर को जानना ज़रूरी है जहां उनका जन्म और पालन-पोषण हुआ. दरअसल, वे इस धरती के पहले योद्धा नहीं हैं. बस्तर के संघर्ष का इतिहास हिडमा या उनके नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी से शुरू नहीं हुआ था. लिखित इतिहास के अनुसार, भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शुरू होने से तीन दशक पहले, 1825 में, गेंद सिंह नाम के एक आदिवासी ज़मींदार ने पहला विद्रोह का झंडा बुलंद किया था. वे परलाकोट विद्रोह के नेता थे, उन मराठा राजाओं के खिलाफ जिन्होंने अंग्रेजों की मदद से आदिवासियों के अधिकारों पर कठोर प्रहार किया था. शासकों ने अंततः उन्हें फांसी पर लटका दिया.

You might also like

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

उसके बाद भी, कई छोटे-बड़े विद्रोह हुए. हालांकि, 1910 के भूमकाल विद्रोह और उसके नेता गुंडाधुर का इतिहास अलग है. उन्होंने कई जनजातियों – कोया, दारवा, मारिया, मुरिया, गोंड, हल्बा, भत्रा – को एकजुट करके ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट कानूनों के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी, वह एक अधिक संगठित और व्यापक विद्रोह था.

आज़ादी के बाद 1960 के दशक में, आदिवासियों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने पर इंदिरा गांधी सरकार द्वारा की गई गोलीबारी में प्रबीर चंद्र भंजदेव नामक एक राजा की जान चली गई थी. इस इतिहास को जल, जंगल और ज़मीन के अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष के संदर्भ में भी बताया जाना चाहिए.

अब सवाल उठता है – क्या लंबे संघर्ष का समय बीत चुका है ? क्या आज सशस्त्र संघर्ष का रास्ता कारगर है ? चीनी रास्ता ? रूसी रास्ता ? ऐसी कई बहसें हैं, खासकर तेलुगु समाज में. लेकिन लिखित जानकारी पर गौर करें तो पता चलता है कि बस्तर में लगभग 200 वर्षों का लंबा संघर्ष का इतिहास है. कितना सशस्त्र है और कितना निहत्था, यह सिर्फ़ जनता ही तय नहीं करती, बल्कि समय और परिस्थितियां भी तय करती हैं, कभी-कभी दुश्मन उस रास्ते को आगे बढ़ा देते हैं.

प्रबीर चंद्र ने हथियार नहीं उठाए. विजय भास्कर (सुखदेव) के 1989 में गुरिल्ला कमांडर के रूप में उत्तर बस्तर के केसकाल क्षेत्र में जाने से पहले भी, कुएमारी में बॉक्साइट खनन के खिलाफ संघर्ष शुरू करने वाले स्थानीय गोंड आदिवासियों ने हथियार नहीं उठाए थे. सुखदेव, जो उनके संघर्ष में शामिल हुए, ने उन्हें हथियार उठाने के लिए नहीं कहा. उन्होंने उन्हें कानूनी रास्ता दिखाया, उन्हें सड़कों पर उतरकर धरना और जुलूस निकालने के लिए प्रोत्साहित किया.

उन्होंने खुद उन्हें प्रेरित करने के लिए ‘संगे दकाल… बाटो कु ए खदान तूं बंद किआला’ गीत लिखा और गाया. बस्तर के लोग उनसे बहुत पहले इस मार्ग में पारंगत हो चुके थे जो आज लोकतांत्रिक संघर्ष, संवैधानिक संघर्ष का ढोल-नगाड़ा पीट रहे हैं. सुखदेव ने हथियार उठाए, लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि एकमात्र मंत्र सशस्त्र संघर्ष है. न ही उनकी पार्टी ने ऐसा कहा. सशस्त्र संघर्ष कैसे मुख्य रूप बन गया, इसका ऐतिहासिक विवरण बाद में दिया जाएगा.

1993 में जब सरकार ने स्टील फैक्ट्री बनाने के लिए मौलीबाट में आदिवासियों की ज़मीन जबरन छीन ली, तो विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाले लोगों का माओवादी पार्टी से कोई संबंध नहीं था. जब उन्होंने विरोध प्रदर्शन में शामिल होकर जनता के साथ एकजुट होकर बस्तर के पूर्व कलेक्टर बी.डी. शर्मा के गले में जूता लटकाकर और उनके चेहरे पर कालिख पोतकर उन्हें अपमानित किया, तो बस्तर की जनता ने अपनी आंखों से देखा कि उनके संवैधानिक, शांतिपूर्ण संघर्ष पर राज्य का दमन कितना क्रूर हो सकता है. उन्हें समझ आ गया कि इसकी सीमाएं कहां हैं.

सन् 2000 में, नगरनारे में, एक स्टील फैक्ट्री के नाम पर ग्राम सभा का फैसला पलट दिया गया, ज़मीनें ज़ब्त कर ली गईं – तब भी आदिवासी सिर्फ़ लाठियों और पत्थरों से ही लड़े. उन्हें न तो लंबे संघर्ष का सिद्धांत पता था, न ही माओवादी विचारधारा. उन्हें बस इतना पता था – अगर प्रतिरोध नहीं करोगे, तो ज़िंदा नहीं बचोगे.

2005 में, टाटा कंपनी फिर से लोहंडीगुड़ा में ज़मीन हड़पने आई – तब माओवादी पार्टी का अस्तित्व नहीं था. लेकिन इस एहसास ने कि अगर उन्होंने विरोध नहीं किया, तो ज़मीन छीन ली जाएगी; अगर उन्होंने विरोध किया, तो उन्हें बेघर मज़दूरी की ज़िंदगी जीने पर मजबूर होना पड़ेगा – उनके हाथों के औज़ारों को हथियार बना दिया.

तभी, इन कॉर्पोरेट परियोजनाओं के लिए एक अग्रिम मोर्चे के रूप में ‘सलवा जुडूम’ की शुरुआत हुई – पश्चिमी और दक्षिणी बस्तर के गांवों को खाली कराना, गांवों को जलाना, बलात्कार, हत्या, लूटपाट, आगजनी – और इसे ‘माओवादियों से आदिवासियों का बदला’ कहकर झूठा प्रचार, प्रेस का दमन – जो निर्मम फासीवादी दमन का प्रतीक था. मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार, जून 2005 से 2006 के अंत तक 640 से ज़्यादा गांव जला दिए गए, 1,200 से ज़्यादा लोग मारे गए. सैकड़ों महिलाओं ने बलात्कार की गवाही दी है.

सलवा जुरम में दो साल के बच्चों से लेकर साठ साल के बुज़ुर्गों तक, हर उम्र के लोगों को मार डाला गया. हज़ारों लोगों को यातना शिविरों में भेज दिया गया. दूसरी ओर, इसे मूल निवासियों का विद्रोह कहा गया.

इस अत्याचार के बीच, हिडमा का नाम पहली बार सितंबर 2007 में मीडिया में आया जब उरपलमेटा गांव के पास 24 सीआरपीएफ जवान मारे हो गए. हिडमा लगभग 60-70 गुरिल्लाओं की एक कंपनी का नेतृत्व कर रहा था. 200-300 सुरक्षा बलों ने कई गांवों पर हमला कर उन्हें जला दिया. जब ग्रामीणों ने उन्हें इसकी सूचना दी, तो हिडमा और उनके साथी चार-पांच किलोमीटर दौड़े और सुरक्षा बलों को घेर लिया. उनके हमले में 24 जवान मारे गए.

इस जीत से जनता में आत्मविश्वास जगा है. हिडमा को भी. कार्यकर्ताओं को उनके नेतृत्व पर भरोसा है. कुल मिलाकर, इससे पार्टी को जनयुद्ध के विकास में नया आत्मविश्वास मिला है.

आज सरकार द्वारा नियुक्त मीडिया हिडमा को ‘हत्यारा’ कह सकता है – चाहे वे उसे तारिमेटाला में 76 सैनिकों की मौत का ‘हत्यारा’ कहें – लेकिन सवाल यह है कि क्या हिडमा जन्मजात हत्यारा था ? क्या उसने दूसरों के इलाकों में घुसपैठ की थी ? वहां मौजूद इतने हज़ारों सैनिकों, सीआरपी, नागा, मिज़ो बटालियनों, का क्या काम था ? वे क्यों गए थे ? किसके आदेश पर ? किस क़ानून के तहत उनके गांवों को उजाड़ा गया ? महिलाओं को घसीटकर क्यों ले जाया गया और उनका बलात्कार क्यों किया गया ? सिर्फ़ उन्हीं को क्यों मारा गया जो उन्हें मिले ?

10 अप्रैल, 2010 – तारिमेटाला में चार घंटे तक युद्ध चला. आम लोग थके हुए गुरिल्लाओं को दूध-चावल खिलाने के लिए युद्धभूमि की ओर दौड़ पड़े।श. वे अपने कंधों पर 20 से ज़्यादा घायल लड़ाकों और 12 मारे गए साथियों को ढो रहे थे. लेकिन हिडमा के साथ कौन लड़ा ? वे लड़ाके कौन थे जो उसके इशारे पर जान हथेली पर लेकर कूद पड़े ? ये वे लोग थे जिनके घर और गांव सलवा जुडुम में जलाकर राख कर दिए गए थे. ये वे लोग थे जिनके परिवार मारे गए थे. उनके लिए युद्ध कोई इच्छा नहीं – एक अनिवार्यता है. वे योद्धा बन गए हैं. हिडमा उनका नेता बन गया है. यह एक अपरिहार्य ऐतिहासिक परिणाम था.

2005-06 तक, गुरिल्ला मुख्यतः जाल (माइन) पर निर्भर थे, लेकिन बाद में उन्होंने घेरकर हमला करने का तरीका अपनाया. हिडमा इस बदलाव की अग्रदूतों में से एक थीं।श. उन्होंने कई हमलों की योजना बनाई और उनका नेतृत्व किया. उन्होंने अपनी खुद की युद्ध शैली विकसित की. वह अपनी मातृभूमि की भौगोलिक स्थिति से लोगों की ताकत और कमजोरियों को जानते थे. उन्होंने हर चीज़ की योजना बनाई, कौन सा हथियार कहां इस्तेमाल किया जाएगा, कौन सा लड़ाकू कहां तैनात किया जाएगा. लोगों ने उन्हें ताकत दी, उन्होंने लोगों को ताकत दी. यही उनकी सफलता का मुख्य रहस्य है.

हिडमा को लोगों ने ही बनाया था – इसे कोई अतिशयोक्ति नहीं कह सकता. वे ही उसकी आंख, कान, हाथ और पैर बन गए हैं. क्योंकि उन्होंने देखा है – उनके गांव जले, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, बच्चों की हत्या हुई – और ‘हीरो’ हिडमा ने उन्हें सज़ा दी है. वह वो योद्धा है जिसने उनकी ज़मीन, नदियां, जंगल और ज़िंदगियां बचाईं. उसकी मौत के बाद, कई गांववालों और परिवारवालों ने कहा – यह एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ थी, उसे पकड़कर मार डाला गया. उनके शब्द पुलिस पर शक से ज़्यादा साफ़ हैं – उनका यह मानना ​​कि आमने-सामने की लड़ाई में हिडमा को कोई नहीं हरा सकता.

ऐसे हिडमा अपने ही इलाके में नहीं, बल्कि धोखे के जाल में फंसाकर मारा गया. जिन लोगों ने कभी आमने-सामने लड़ने की हिम्मत नहीं की – वे उसे निहत्थे पकड़ने में कामयाब रहे. राज्य ने न केवल यह कहा कि अगर वह लड़ाई छोड़ दे, तो बच जाएगे – बल्कि उसके साथ मौजूद कुछ ‘भयावहताएं’ भी उस प्रलोभन में शामिल हो गया. लेकिन वह एक योद्धा के रूप में मरना चाहता था. वह अपने आखिरी सांस तक एक योद्धा बना रहना चाहता था.

भीषण दमन, घेराबंदी, कुछ ही घंटों में दाह संस्कार पूरा करने के सरकारी आदेश के बावजूद – फिर भी सैकड़ों आदिवासी पुत्तुरवेत पहुंच गए. हिडमा और उनके साथी राजे के शवों के पास रोते हुए देखे गए – जिनमें ज़्यादातर महिलाएं थी. शायद पुरुष प्रतिबंध के कारण नहीं आ सके.

जो महिलाएं मौजूद थीं – उन्होंने शायद उसे कभी प्रत्यक्ष रूप से देखा भी नहीं था. उन्होंने सिर्फ़ उसका नाम सुना था. उन्होंने विजय की कहानी सुनी थी. वीडियो में कई महिलाएं अपने बच्चों को गोद में लिए चलती दिख रही थी. उन्होंने अपने रोते हुए बच्चों से क्या कहा, उन बच्चों की आंखों में कैसी छवि बन रही थी – कहना असंभव है. लेकिन यह कहा जा सकता है – हिडमा की विरासत अब खत्म नहीं होगी. हिडमा का इतिहास कभी नहीं मिटेगा…

Read Also –

कॉमरेड हिडमा और 6 अन्य माओवादी कार्यकर्ताओं को पकड़ कर निर्मम हत्या की निंदा करें !
माओवादी के महान नेता माडवी हिडमा ने भगवान बिरसा मुंडा, गुंडाधूर और भगत सिंह के क्रांतिकारी परम्परा को नई ऊंचाई तक ले गये ! – सीपीआई माओवादी
साक्षात्कार-3 : सीपीआई (माओवादी) के महासचिव कॉमरेड बसवराज के साथ अल्फ ब्रेनन की बातचीत
साक्षात्कार 2 : केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रमुख के रूप में सीपीआई (माओवादी) के महासचिव कॉमरेड बासवराज का साक्षात्कार
‘सीपीआई माओवादी के महासचिव बासवराज की हत्या जीवित पकड़े जाने के बाद किया है’ – विकल्प, प्रवक्ता, सीपीआई माओवादी
सीपीआई माओवादी के महासचिव बासवराज के बड़े भाई ने कहा- ‘पार्थिव शरीर परिजनों को नहीं दिया जा रहा है, यह कैसा लोकतंत्र है ?’

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-pay
Previous Post

नेपाल : श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद क्षेत्र में तीसरे जन आंदोलन ने भ्रष्ट हाकिमों की नाक में दम कर दिया, लेकिन बुनियादी परिवर्तन का कार्यभार अभी भी अधूरा है !

Next Post

हिड़मा एनकाउंटर: सोशल मीडिया पर हमदर्दी की लहर, मीडिया में विवाद और नक्सलवाद के खात्मे का सवाल

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

by ROHIT SHARMA
March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमारी पार्टी अपने संघर्ष के 53वें वर्ष में फासीवाद के खिलाफ अपना संघर्ष दृढ़तापूर्वक जारी रखेगी’ – टीकेपी-एमएल की केंद्रीय समिति के राजनीतिक ब्यूरो के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
Next Post

हिड़मा एनकाउंटर: सोशल मीडिया पर हमदर्दी की लहर, मीडिया में विवाद और नक्सलवाद के खात्मे का सवाल

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

G7 शिखर सम्मेलन और एक न्यायपूर्ण विश्व की आवश्यकता

June 16, 2024

दिल्ली चुनाव का संदेश : लोक-सापेक्ष तंत्र ही धर्म-सापेक्ष तंत्र को परास्त कर सकता है

February 29, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.