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आम आदमी पार्टी और कुमार विश्वास का संकट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 3, 2017
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कहा जाता है कि जो समाज जितना ज्यादा पिछड़ा और विभाजित होता है और शिक्षा की सकारात्मक भूमिका जितना ही निम्न होता है, वहां काल्पनिक और आरोपित सत्य के आधार पर जन-भावनाओं को प्रभावित करना उतना ही आसान होता है. भारत इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. यहां सत्ता गरीबों में खैरात बांटती है और मध्यम वर्ग में सपने परन्तु, वास्तविक भला उस वर्ग का होता है जो सत्ता के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव में होते हैं और दोनों ही एक-दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हैं. यही कारण है कि गरीबों में जब कभी सत्ता से लड़ने का जज्बा पैदा हुआ है, तो सत्ता के बनाये सपने में डूबा मध्यम वर्ग एक समय बाद नींद में चलता हुआ सत्ता के बनाये किसी गड्डे में जा गिरता है और लोगों को भी उसी गड्डे में जा गिरने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिसमें वह खुद गिरा हुआ होता है. सपने में डूबा हुआ यह वर्ग बिल्कुल ही नशे की हालत में होता है, इसे समझाया नहीं जा सकता, इसे दुनिया की कोई भी तर्क समझ में नहीं आती, जब तक कि वह खत्म न हो जाये अथवा उसको कोई ऐसा आघात न लगे जो उसे सपने के नशे की खुमारी से बाहर निकाल दें.
आम आदमी पार्टी के संस्थापक और निःसंदेह बेहद ही प्रभावशाली कवि कुमार विश्वास आज ठीक इसी तरह एक सत्ता के बनाये सपने की दुनिया में जी रहे हैं. निःसंदेह आम आदमी को आज उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, पर वे आज सत्ता के बनाये सपने की नशे में जिस तरह मदहोश होकर बड़बड़ा रहे हैं, वह एक गंभीर राजनैतिक आन्दोलन के लिए बेहद ही खतरनाक है. वैसे तो ये भी माना जाता है कि कवि हृदय बेहद ही संवेदनशील होता है और वह अपनी संवेदनशीलता में हीं कल्पना जगत कीं सारी दुनिया घूम आता है, उसकी नई व्याख्या बहुधा काल्पनिक ही होता है, पर कर डालता है. जबकि वास्तविक जगत में चलने वाला हर मनुष्य यह जानता है गलतियां कहां हो रही है ? जिस प्रकार सत्ता के द्वारा परोसे गये सपनों के नशे में कुमार विश्वास हैं, उन्हें समझाया नहीं जा सकता, उन्हें केवल कुछ कदम भर साथ में ले कर चला जा सकता है पर उन्हें केवल वास्तविक ठोकरें ही सत्ता के बनाये सपने की नशे से बाहर ला सकता है.
एक बेहद ही संवेदनशील चिकित्सक अपने मरीज का आॅपरेशन नहीं कर सकता ठीक उसी प्रकार एक बेहद ही संवेदनशील व्यक्ति समाज को व्याप्त समस्याओं से छुटकारा नहीं दिला सकता. यही कारण है कि आम आदमी पार्टी को दिल से चाहते हुए भी बेहद संवेदनशील प्रखर कवि कुमार विश्वास भारतीय जनता पार्टी के द्वारा फैलाये गये सपनों की दुनिया में अभी विचरण कर रहे हैं. उनको वास्तविक जीवन की कष्टप्रद बदलाव प्रक्रिया प्रभावित नहीं कर पा रहा है. वे कुछ भी समझने-बुझने की स्थिति में नहीं हैं. बेहतर होगा उन्हें स्वयं ठोकर खा कर सम्भलने का मौका दिया जाय. बेशक इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे-न केवल आम आदमी पार्टी के लिए ही वरन् देश के आम आदमी के लिए भी-न केवल बेहद ही जरूरी है, वरन् उनके जैसा ईमानदार और प्रतिभाशाली व्यक्ति का खो जाना आम आदमी पार्टी के लिए बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है. पर कुछ जरूरी मसले होते हैं, जिसका निपटारा ही सबसे जरूरी हो जाता है क्योंकि इस सपने की हालत में रहते हुए कुमार विश्वास अपने ही बनाये अनुशासन की सीमा को लांघ जा रहे हैं, अपनी ही कमिटी के निर्णय के विरूद्ध बिकाऊ मीडिया के सामने बिछ जा रहे हैं. बेहतर होगा उन्हें समझने का कुछ वक्त दे दिया जाये ताकि वे पुनः मजबूत होकर आ सके जैसे अमेठी की हताशा से उबर कर वह मजबूती के साथ सामने आ गये थे.

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