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क्या ईरान के बारे मे दुनिया भ्रम और ग़लतफ़हमी का शिकार है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 21, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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क्या ईरान के बारे मे दुनिया भ्रम और ग़लतफ़हमी का शिकार है ?
क्या ईरान के बारे मे दुनिया भ्रम और ग़लतफ़हमी का शिकार है ?

क्या ईरान के बारे मे दुनिया भ्रम और ग़लतफ़हमी का शिकार है ? इस लेख के लेखक सुजीत जॉन, टाईम्स ऑफ इंडिया के बिज़नेस एडिटर है, जो नवंबर में ईरान में थे, का तो यही कहना है कि उनके तेहरान दौरे से सारे भरम टूट गए.

ईरान की हकीकत और रोजमर्रा की जिंदगी ग्लोबल मीडिया की सुर्खियों से अलग है. नवंबर में, जब लेखक ने तेहरान में तीन दिन बिताए, तो वहां पहुंचते ही उन्हें अमेरिका में रहने वाले एक दोस्त से मैसेज मिला जिसमें लिखा था कि वहां की सभी महिलाओं को हिजाब पहनना जरूरी है. लेकिन यह बात कितनी गलत थी !

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नौजवान महिलाएं हिजाब नहीं पहनतीं !

कुछ बुज़ुर्ग महिलाओं को छोड़कर, सार्वजनिक जगहों पर किसी ने भी हिजाब पहनना तो दूर की बात है, अपने सिर पर स्कार्फ तक नहीं पहना हुआ था. हमें बताया गया कि रेस्टोरेंट में, अगर कोई महिला अपने सिर पर स्कार्फ ओढ़े बैठी हो, तो कोई युवा महिला उसके पास आकर, उसका स्कार्फ हटाकर कह सकती है, ‘इस आंदोलन के साथ धोखा मत करो.’

यह ‘औरत, जिंदगी, आजादी’ आंदोलन का जिक्र है, जिसकी शुरुआत सितंबर 2022 में महसा अमीनी नाम की एक युवा कुर्द-ईरानी महिला की मौत के बाद हुई थी; पुलिस ने उसे कथित तौर पर ठीक से हिजाब न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया था. हां, दशकों से लगे पश्चिमी बंदिशों का अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है.

महंगी कारों में दिलचस्पी !

लेखक को एयरपोर्ट से लेने के लिए जिस व्यक्ति को भेजा गया था, उसे कारों में काफी दिलचस्पी थी. इसलिए, होटल तक पहुंचने में लगे एक घंटे के सफर के दौरान, वह अक्सर उन अलग-अलग कार मॉडल्स की तरफ इशारा करता रहा जिनके पास से वह गुजर रहे थे – जिनमें ज़्यादातर यूरोपियन ब्रांड्स थे.

उसने बताया कि अब ईरान में उन मॉडल्स का उत्पादन नहीं होता, लेकिन उनके मालिक चीन से पार्ट्स मंगवाकर या स्थानीय स्तर पर ही उन्हें रिवर्स-इंजीनियर करके किसी तरह उन्हें चलाए हुए हैं. वे कारें पुरानी लग रही थीं. यहां तक कि जिस कार में वह बैठे थे, वह भी अपनी बेहतरीन हालत का दौर काफी पहले ही पीछे छोड़ चुकी थी. जो कुछ नई कारें दिखती हैं, वे महंगी और बाहर से मंगवाई गई कारें हैं. शहर भी पुराना-सा लगता है; यहां आधुनिक इमारतें बहुत कम हैं.

भारत के मुकाबले ईरान कम धार्मिक !

लेकिन सामाजिक तौर पर, ईरान उससे बहुत अलग है जैसा हममें से ज्यादातर लोग सोचते हैं. भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने उन्हें बताया कि आज ईरान शायद भारत के मुकाबले कम धार्मिक है.

तेहरान की एक-तिहाई मस्जिदें बंद पड़ी हैं !

उनमें से एक ने कहा कि तेहरान की एक-तिहाई मस्जिदें बंद हो चुकी हैं, क्योंकि वहां कोई जाता ही नहीं है. पूरे ईरान की मस्जिदों के लिए यही बात सच है. जो लोग वहां जाते हैं, वे ज़्यादातर वे लोग होते हैं जिन्हें सरकार से आर्थिक मदद मिलती है, जो धार्मिक संस्थाओं के जरिए बांटी जाती है. यह उस ग्रांट की शर्तों में से एक है.

नौजवानों की पार्टियां, डेटिंग, संगीत और महफिलें !

लेखक जिससे भी मिले, उसने यहां की जबरदस्त नाइटलाइफ के बारे में बताया. पूरे हफ्ते चलने वाली प्राइवेट पार्टियां, डेटिंग, संगीत और महफिलें. एक शाम, हम एक खुले फूड-कोर्ट में थे. वह जगह नौजवानों से खचाखच भरी थी – कोई ग्रुप में था, तो कोई जोड़े में; लड़के और लड़कियां, सब मौजूद थे. एक मेज पर, एक युवती बैठी थी जिसने सिर पर कुछ ऐसा पहना हुआ था जो देखने में किसी भेड़िये के सिर जैसा लग रहा था. ऐसा लग रहा था मानो हम सैन फ़्रांसिस्को या बेंगलुरु में हों.

भारतीय मुसाफिरों से किराया नहीं लेते !

एक और बात जो सबसे ज्यादा उभरकर सामने आई, वह थी आम ईरानी लोगों की गर्मजोशी. दुकानदार अक्सर चीजे मुफ्त में दे देते हैं. हमने ऐसे टैक्सी ड्राइवरों की कहानियां भी सुनीं, जिन्होंने यह जानने के बाद कि यात्री भारत से है, किराया लेने से ही मना कर दिया.

जिस कॉन्फ्रेंस में लेखक गए थे, वह जहां एक तरफ विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ईरान की ताक़त का प्रदर्शन थी, वहीं उसका मुख्य मकसद BRICS देशों – और उनके शोधकर्ताओं – को एक साथ लाना भी था, ताकि दुनिया की डॉलर पर निर्भरता को कम करने के तरीके खोजे जा सकें. ईरान इसके विकल्प के तौर पर क्रिप्टो और ब्लॉकचेन की ओर देख रहा है.

ईरानी लोग किसी देश के बारे में अपमानजनक नहीं बोलते.
ईरान सरकार के कई अधिकारियों और शिक्षाविदों ने अपनी बात रखी. सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि, भले ही यह कार्यक्रम पिछले साल इज़रायल और अमेरिका के हमलों के पांच महीने से भी कम समय बाद हो रहा था, फिर भी किसी भी देश के बारे में कोई अपमानजनक टिप्पणी नहीं की गई, जोरदार भड़ास निकालना तो दूर की बात है. भाषण और चर्चाएं बिल्कुल सीधी-सादी और तथ्यों पर आधारित थीं.

डॉलर से मुकाबले की हिमायत

जैसे कि जब तेहरान नगर परिषद के सदस्य अली असगर गेमी ने हमसे कहा – ’50 साल से भी ज्यादा समय हो गया है जबसे हमारे देश के अमेरिका के साथ विवाद चल रहे हैं. और हमने इसके नतीजे अपनी आंखों से देखे हैं—युद्ध और तबाही.

इसलिए, हम हर उस देश के साथ पूरी तत्परता से सहयोग कर रहे हैं जो अपनी अर्थव्यवस्था को ‘डी-डॉलर’ (डॉलर पर निर्भरता कम) करना चाहता है. भारत का भी यही साझा उद्देश्य है… आपका भी अमेरिका के साथ टकराव रहा है, और आपके देश ने उसे बहुत ही बेहतरीन तरीके से संभाला है.’

ये और ऐसी ही दूसरी बातचीत आज भी तब याद आती हैं, जब दुनिया ईरानी शासन के बारे में बात करती है. पश्चिमी देश अक्सर इस शासन को इस्लामी कट्टरपंथियों का एक ही ढर्रे पर चलने वाला गुट (monolithic bloc) बताते हैं. लेकिन असलियत शायद इससे काफी अलग हो.

कई लोगों ने उन्हें बताया कि यह शासन कट्टरपंथियों और सुधारवादियों का एक मिला-जुला रूप है, और ऐसा लगता है कि सुधारवादियों का पलड़ा अब भारी होता जा रहा है. यहां तक कि कट्टरपंथी भी शायद अब उतने कट्टर नहीं रहे, जितने वे कभी हुआ करते थे.

भारतीय दूतावास के एक सीनियर अधिकारी पहले तेल अवीव में तैनात थे. हमने उस अधिकारी से पूछा कि ईरान और इज़रायल में से कौन, दूसरे पक्ष के ‘बुरे’ इरादों को लेकर ज़्यादा गलतफहमी में है. उनका तुरंत जवाब था, ‘दोनों ही बराबर गलतफहमी में हैं.’

महिलाएं बेख़ौफ़ रात में हाइवे किनारे सो जाती हैं

लेखक की वापसी की फ़्लाइट में नरगिस मोत्ताघी भी थीं, जो एक डेटा साइंटिस्ट हैं और इस्फ़हान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में ICT डिपार्टमेंट की हेड हैं. वह अपने भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई मंगेतर और उसके परिवार से मिलने बेंगलुरु आ रही थीं. उनका सपना NASA में साइंटिस्ट बनने का था – लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से उनका यह सपना टूट गया. वह हिजाब पहनती हैं.

उन्होंने बताया, ‘इसकी वजह से पुरुष मुझे एक इंसान के तौर पर देखते हैं, न कि सिर्फ एक औरत या एक सुंदर चेहरे के तौर पर,’ लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वह 2022 में हिजाब के ख़िलाफ़ हुए महिलाओं के विरोध प्रदर्शन का पूरी तरह से समर्थन करती हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि ईरान की कई साइंस और टेक यूनिवर्सिटीज़ में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज़्यादा है. पुरुष बिज़नेस में जा रहे हैं, हायर एजुकेशन नहीं कर रहे हैं, जिसकी वजह से अक्सर शादियों में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. तलाक़ की दर लगभग 50% है. वीकेंड पर, नरगिस एडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए पूरे ईरान में अकेले गाड़ी चलाकर घूमती हैं, और कभी-कभी हाईवे के किनारे रुककर सो भी जाती हैं. उन्होंने कहा, ‘महिलाओं के लिए यह पूरी तरह से सुरक्षित है.’

  • आर. के. जैन

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