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कश्मीर विवाद का सच

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 8, 2019
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कश्मीर विवाद का सच

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

ज्यादातर ये देखा जाता है कि कश्मीर को मुसलमानो से जोड़ दिया जाता है लेकिन सच कहूं तो अगर आज कश्मीर हिन्दू बहुल भी होता तो भी आज भारत के लिये इतना ही समस्याग्रस्त होता जैसे वो अभी मस्लिम बहुल होने से है. क्योंकि समस्या हिन्दू या मुस्लिम की नहीं है, ये तो सिर्फ राजनैतिक हथकंडा है जिसे नेता लोग वोटबैंक भुनाने के चक्कर में जानबूझकर बनाये बैठे हैं. असल समस्या तो कश्मीर-पाकिस्तान (PoK) और कश्मीर-चीन (अक्साई चीन) है, जिन पर ये दोनों देश अनाधिकृत अधिकार किये बैठे हैं लेकिन ये नेता असली समस्या को छोड़ भारत के ही एक राज्य भू-भाग (जम्मू और कश्मीर) को एक समस्या बताकर अपनी वोट बैंक की राजनीति करते हैं. कश्मीर की असल स्थिति के बारे में मैंने पूर्व में लिखा था जिसे अगर पढ़कर भी अगर आपका समाधान न हो रहा हो तो इसे ऐसे समझिये कि भारत के राज्य ‘जम्मू और कश्मीर’ में 22 जिले हैं, जिसमें से 19 जिलों में कोई समस्या नहीं है और पूर्णतः शांति है. इन 19 जिलों में किसी भी तरह का अलगाववाद या अशांति नहीं है. केवल 3 जिले हैं, जिसमे मात्र 15% अलगाववादी रहते हैं, जो कश्मीर को भारत हिस्सा नहीं मानते और उन 3 जिलों में भी केवल 28 नेता ही अलगाववादी हैंं, जिन पर मोदी सरकार भी अभी तक 500 करोड़ सालाना खर्च कर रही है.

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समाचारीय घोषणाओं को सीरियसली मत लीजिये (अभी तक किसी भी अलगाववादी की सुरक्षा नहीं हटायी गयी है क्योंकि इन्हीं नेताओं के साथ तो गठबंधन करके सरकार बनानी है तो फिर सुरक्षा कैसे हटायी जा सकती है). अपने आपको जनता का सेवक और देश का चौकीदार कहने वाले मोदी कश्मीर राग पर सिर्फ हुंकार भरते हैं. जोश दिलाने वाले भाषण बड़े अच्छे तरीके से बोलते हैं, मगर वे इन अलगाववादियों की सुरक्षा में क्यों खर्च कर रहे हैं अथवा सेना को सीधे-सीधे जाकर इन अलगाववादियों को घेरकर मारने का आदेश क्यों नहीं देते ? (इसका जवाब वो नहीं देंगे. मगर मैं आपको बता देता हूंं). क्योंकि जैसे ही इनकी सुरक्षा व्यवस्था हटाई जायेगी और सेना द्वारा इन्हें ख़त्म किया जायेगा अर्थात सीधा जाकर गोली मार दी जायेगी, उसके अगले ही पल कश्मीर से जिहाद ख़त्म हो जायेगा. वैसे सेना को भी गोली मारने की जरूरत नहीं क्योंकि जैसे ही सुरक्षा हटायी जायेगी, खुद जिहादी ही इन अलगाववादियों को मार डालेंगे और देश की जनता के खून-पसीने की कमाई का 500 करोड़ सालाना खर्च भी बचेगा. पर मोदी ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि ऐसा करते ही तो मोदी की राजनीति रोटी जल जाएगी और कश्मीर मुद्दा हमेशा के लिये ख़त्म हो जायेगा. जब मुद्दा ही ख़त्म हो जायेगा तो चुनाव में कश्मीर का राग कैसे अलापेंगे ?

 

कश्मीर विवाद का सच

कट्टरवाद का पोषण करने और हिन्दू-मुस्लिम करने से पहले हमेशा ये याद रखियेगा कि इस नोट में जो नक्शा मैंने लगाया है वो पूर्ण कश्मीर का नक्शा है जो एक आज़ाद मुल्क था ! ये संयुक्त से विभक्त कैसे हुआ ये भी जान लीजिये कि जब कश्मीर का विलय भारत में नहीं हुआ था (पूरा विवरण विकिपीडिया पर पढ़ें) और जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश से आज़ाद हुआ और पाकिस्तान भारत से अलग हुआ यानि 1947 में पाकिस्तान समर्थित कुछ हजार कबायली कश्मीर में आ घुसे (ध्यान रहे- कश्मीर में घुसे, भारत में नहीं क्योंकि तब तक कश्मीर रियासत ने भारत में शामिल होने का फैसला नहीं किया था). उन्होंने कश्मीर में बहुत कोहराम मचाया, बाजारों को लूटा, कत्ल किये. बच्चों को भी नहीं छोड़ा और औरतों के साथ बलात्कार किया.




इससे परेशान होकर कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत से मदद मांगी. उस समय नेहरू ने उसे ‘ब्लैकमेल’ किया और कहा ‘भारत में विलय करो तो हम मदद करेंगे’ और इस तरह कश्मीर का भारत में विलय हुआ. संधि पर दस्तखत होने के बाद नेहरू ने कश्मीर में भारतीय सेना भेजी. जब तक भारतीय सेना उन्हें खदेड़ पाती, वे बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुके थे और जब तक युद्ध खत्म हुआ, तब तक 5,134 वर्गमील का इलाका उनके कब्जे में चला गया था, जिसे आज POK अर्थात पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है (जिस कश्मीर समस्या का दोष आज बीजेपी और भक्त नेहरू के मत्थे मढ़ते हैंं, वो असल में भारत का हिस्सा भी नेहरू की वजह से है वरना वो आज भारत के बजाय पाकिस्तान का हिस्सा होता क्योंकि एक तो राजा हरिसिंह का रुझान भी पाकिस्तान की तरफ था और दूसरा पटेल कश्मीर को भारत में मिलाना ही नहीं चाहते थे).

कश्मीर समस्या पर बोलने से पहले एक बार कश्मीर का इतिहास भी पढ़ लीजिये – कश्मीर का इतिहास अति प्राचीन काल से आरंभ होता है. समय के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभावों का संश्लेषण हुआ, जिससे यहां के पांच मुख्य धर्म स्थापित हुए – जैन, बौद्ध, वैदिक (हिन्दू), सिख और इस्लाम. कश्मीर का प्राचीन इतिहास 12 ईस्वी में लिखी गयी राजतरंगिणी में लिखा है, जिससे साफ पता चलता है कि कश्मीर का प्राचीन नाम ‘काश्यपमेरु’ था, जो बाद में ‘कश्मीर’ हुआ. इस काश्यपमेरु पर जैन राजाओं का ही राज था. बाद में जैन राजाओं के वंश ने सम्राट अशोक के बौद्ध दर्शन को अंगीकार किया. तब भी कश्मीर सम्राट अशोक के राज्याधीन ही था.




लगभग तीसरी शताब्दी में अशोक का शासन था, तभी यहां बौद्ध धर्म का आगमन हुआ, जो आगे चलकर कुषाणों के अधीन समृद्ध हुआ था (ये कुषाण ही बाद में हिन्दू बने, लेकिन तब वे किसी भी धर्म का पालन नहीं करते थे). बाद में सम्राट अशोक के प्रपौत्र महाराज सम्प्रति ने पुनः कश्यपमेरु पर अधिकार किया और अपने पूर्वजों के धर्म जैन दर्शन को स्वीकार किया (इसका कारण कश्यपमेरु में स्थित वो जैन तीर्थ था, जो जैनों की अधिष्ठायिका देवी चक्रेश्वरी द्वारा अधिष्ठित था और प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का था, जिसके दर्शन से उन्हें ज्ञात हुआ कि ये उनके पूर्वजों ने बनाया था). सम्प्रति का शासन काल ईसा पूर्व 224 से ईसा पूर्व 215 तक रहा और ये अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ ईसा पूर्व 185 तक चला. तब तक कश्मीर मोर्योंं के अधीन ही था.

बाद में गुप्तों (गुप्त वंश), कुषाणों एवं सातवाहनों में लम्बा आपसी संघर्ष चला, जो गुप्त साम्राज्य के (550 ई.) पतन तक चला क्योंकि बुद्ध गुप्त के उत्तराधिकारी अयोग्य निकले और हूणों के आक्रमण का सामना नहीं कर सके. हूणों ने सन् 512 में तोरमाण के नेतृत्व में हमला किया और एक बड़े क्षेत्र पर अधिपत्य कायम कर लिया. इसके बाद सन् 606 में हर्ष का शासन आने के पहले तक कश्मीर में अराजकता छाई रही. 6ठी शताब्दी में उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के अधीन होने के बाद इसमें हिन्दू धर्म का आगमन हुआ और उनके बाद ललितादित्या शासक रहा, जिसका काल 697 ई. से 738 ई. तक था. अवन्तिवर्मन ललितादित्या का उत्तराधिकारी बना. उसने श्रीनगर के निकट अवंतिपुर नगर बसाया और उसे ही अपनी राजधानी बनाया, उसके खंडहर अवशेष आज भी मौजूद हैं.




बाद में, मोह्म्मद के समय (जब इन कथित वैदिकों को जो उस समय बदो समुदाय कहलाता था और हिंदुकुश की पहाड़ियों के आसपास फैला था) मोहम्मद द्वारा वहांं पर इस्लाम की स्थापना के बाद मारा जाने लगा तो ये भाग कर कश्मीर आये और कश्मीर में आकर बस गये, बाद में ‘कश्मीरी पंडित’ कहलाने लगे. ये समय लगभग 6ठी सदी का अंत था और उसके बाद जैनों और वैदिकों में लड़ाई होती रही जिस कारण कभी जैन तो कभी वैदिक राजाओं का राज चलता रहा. (12वीं सदी के आसपास इन बदो ने जैनों के चक्रेश्वरी देवी अधिष्ठित तीर्थ आदिनाथ पर कब्ज़ा कर मंदिर तोड़ दिया और चक्रेश्वरी देवी का चमत्कार देख उसे एक गुफा में विराजित कर दिया, जिसे अब ‘वैष्णो देवी’ के नाम से जाना जाता है).

इसी क्रम में कोट रानी अपने पति की मृत्यु के बाद रानी बनी थी, जिसे सेनापति ने राजनितिक समीकरणों से तालमेल बिठाकर विवाह कर लिया और राजगद्दी पर काबिज़ हो गया. ये समय 13वीं सदी और 14वीं सदी के मध्य का था. बाद में वहां सूफी राज स्थापित हुआ, जो 16वीं सदी तक चला (आज भी सूफी राज के गवाह सोने और चांदी के सिक्के लोगों के पास संग्रहित है). बाद में अकबर के समय वहां पर मुग़ल शासन स्थापित हुआ. मुग़ल साम्राज्य के विखंडन के बाद पठानों ने कश्मीर पर कब्ज़ा किया, जिसे कश्मीर का काला काल कहा जाता है.




बाद में 18वीं सदी के शुरू में महाराजा रणजीत सिंह ने पठानों से युद्ध कर हराया और कश्मीर में सिख साम्राज्य की स्थापना की, जो अंग्रेजों से पराजय तक चलता रहा. 1846 की लाहोर संधि इसका सबूत है. अंग्रेजों के अधीन महाराजा कश्मीर पर राज करते रहे, इसी कड़ी में महाराज हरिसिंह को 1925 में गद्दी पर बिठाया गया, जो अंग्रेजों की नुमाइंदगी के तौर पर राजा बने थे, जो कश्मीर के भारत गणराज्य में विलय तक गद्दी पर आसीन रहे. भारत के आज़ाद होने के बाद भी कश्मीर रियासत को पटेल ने भारत में नहीं मिलाया.

कश्मीर की भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के साथ संधि थी और चूंंकि संधि पहले पाकिस्तान से हुई थी, जिसमें कश्मीर रियासत को तटस्थ रियासत माना गया लेकिन बाद में पाकिस्तान ने कश्मीर विलय के लिए दबाव बनाने के लिये कश्मीर से आवश्यक आपूर्तियों को काट दिया तथा पठानों को शह देकर उत्पात करवाना चालू किया. ये देश के गणराज्य बनने के लगभग तीन महीने बाद की बात है. हालांंकि राजा हरिसिंह का रुझान पाकिस्तान की ओर था, मगर उसे कश्मीर की ये स्थिति मंजूर नहीं थी.

उस समय ‘नेशनल कांफ्रेंस’ जो कश्मीर का सबसे बड़ा लोकप्रिय संगठन था और उसके अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला थे, वे नेहरू के काफी करीबी थे. अतः उन्होंने भारत से रक्षा की अपील की. हरिसिंह ने भी गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को कश्मीर में संकट के बारे में लिखा. बाद में हरिसिंह ने भारत सरकार से भी रक्षा की अपील की जिसके कारण नेहरू ने दबाव देकर कश्मीर का विलय भारत में करवा लिया (वो पूर्व में बता ही चुके हैं).




पाकिस्तान द्वारा हरिसिंह के विलय समझौते में अधिकारिक रूप से कोई प्रश्न नहीं किया गया, इससे कश्मीर का भारत में विलय विधि सम्मत माना गया तथा इसके बाद पठान हमलावरों को खदेड़ने के लिए 27 अक्टूबर, 1947 को भारत ने सेना भेजी लेकिन बाद में पाकिस्तान ने दखलंदाजी शुरू कर दी और कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने से इंकार कर दिया और झगड़ा बढ़ता गया. तब भारत कश्मीर मुद्दे को 1 जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गया.

परिषद ने भारत और पाकिस्तान को बुलाया व स्थिति में सुधार के लिए उपाय खॊजने की सलाह दी. यह 17 जनवरी, 1948 की बात है. भारत और पाकिस्तान के लिए एक तीन सदस्यी संयुक्त राष्ट्र आयोग (यूएनसीआईपी) 20 जनवरी, 1948 को गठित किया गया. तब तक कश्मीर में आपातकालीन प्रशासन बैठाया गया, जिसमें 5 मार्च, 1948 को शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में अंतरिम सरकार द्वारा स्थान लिया गया.

13 अगस्त, 1948 को यूएनसीआईपी ने संकल्प पारित किया, जिसमें युद्ध विराम घोषित हुआ. पाकिस्तानी सेना और सभी बाहरी लोगों की वापसी के अनुसरण में भारतीय बलों की कमी करने को कहा गया और जम्मू-कश्मीर की भावी स्थिति का फैसला ‘लोगों की इच्छा’ के अनुसार करना तय हुआ. संपूर्ण जम्मू और कश्मीर से पाकिस्तान सेना की वापसी व जनमत की शर्त के प्रस्ताव को माना गया, जो कभी नहीं हुआ. (पूर्व में भी जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि कश्मीर को आज़ाद राज्य का दर्जा देकर भारत में तो शामिल कर लिया और जनमत संग्रह की बात भी कह दी, मगर आज तक हमने उन लोगों का दिल जीतने के लिए कभी कुछ नहीं किया. हांं, हमेशा उन्हें आंतक का पर्याय कहकर हिन्दू-मुस्लिम जरूर करते रहे. मौजूदा राजनीतिज्ञों और वैश्विक राजनैतिक हालात में तो दूर-दूर तक ऐसे कोई आसार नहीं हैं कि अक्साई चीन और पीओके को को हम वापस भारत में ला सकें. मगर ऐसी ही नीतियांं रही तो जम्मू और कश्मीर का कश्मीर वाला भाग भी भारत के हाथ से निकल जायेगा).




संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान के अंतर्गत युद्ध-विराम की घोषणा की गई. फिर 13 अगस्त, 1948 को संकल्प की पुनरावृति की गई. महासचिव द्वारा जनमत प्रशासक की नियुक्ति की जानी तय हुई. दिसम्बर, 1963 में एक दुर्भाग्यशाली घटना में हजरत बल मस्जिद से पवित्र अवशेष की चोरी हो गई. मौलवी फारूक के नेतृत्व के अधीन एक कार्य समिति द्वारा भारी आन्दोलन की शुरूआत हुई, जिसके बाद पवित्र अवशेष की बरामदगी और स्थापना की गई.

अगस्त 1965 में जम्मू-कश्मीर में घुसपैठियों की घुसपैठ के साथ पाकिस्तानी सशस्त्र बलों द्वारा आक्रमण किया गया, जिसका भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा मुंहतोड़ जवाब दिया गया. इस युद्ध का अंत 10 जनवरी, 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौते के बाद हुआ. राज्य विधान सभा के लिए मार्च 1967 में तीसरे आम चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस की सरकार बनी. फरवरी 1972 में चौथे आम चुनाव हुए, जिनमें पहली बार जमात-ए-इस्लामी ने भाग लिया व 5 सीटें जीती. इन चुनावों में भी कांग्रेस की सरकार बनी.

भारत और पाकिस्तान के बीच 3 जुलाई, 1972 को ऐतिहासिक ‘शिमला समझौता’ हुआ, जिसमें कश्मीर पर सभी पिछली उद्धोषणाएंं समाप्त की गईं और जम्मू और कश्मीर से संबंधित सारे मुद्दे द्विपक्षीय रूप से निपटाए गये तथा युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा में बदला गया. फरवरी 1975 को कश्मीर समझौता समाप्त माना गया व भारत के प्रधानमंत्री के अनुसार ‘समय पीछे नहीं जा सकता’ तथा कश्मीरी नेतृत्व के अनुसार, ‘जम्मू और कश्मीर राज्य का भारत में अधिमिलन’ कोई मामला नहीं कहा गया. जुलाई 1975 में शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने जनमत फ्रंट स्थापित और नेशनल कांफ्रेंस के साथ विलय किया गया. जुलाई 1977 को 5वें आम चुनाव हुए, जिनमें नेशनल कांफ्रेंस पुन: सत्ता में लौटी.




शेख अब्दुल्ला का निधन 8 सितम्बर, 1982 में होने पर उनके पुत्र डॉ. फारूख अब्दुल्ला ने अंतरिम मुख्यमंत्री पद की शपथ ली व छठे आम चुनावों में जून, 1983 में नेशनल कांफ्रेंस को विजय मिली. ऑल जम्मू और कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस ने अक्टूबर, 1950 को एक संकल्प किया था कि एक संविधान सभा बुलाकर वयस्क मताधिकार लागू किया जाये और अपने भावी आकार और संबद्धता, जिसमें इसका भारत से अधिमिलन सम्मिलित है, का निर्णय लिया जाये तथा साथ में एक संविधान भी तैयार किया जाये. मगर आज तक कोई अमल नहीं हुआ और सदैव सभी शासकोंं (प्राचीन शासकों से लेकर अंग्रेजों तक) ने आम कश्मीरी नागरिकों का हमेशा ही दोहन किया. उन्हें लूटा.

आज़ाद भारत की सरकारों ने भी कभी कश्मीरियों पर ध्यान नहीं दिया, चाहे वो कश्मीर की राज्य सरकार हो या भारत की केंद्र सरकार. कई बार तो सेना ने भी जुल्म किये, चाहे उनका ध्येय कुछ भी हो मगर नागरिकों पर जुल्म ही अलगाववाद / बगावत और आंतकवाद को जन्म देता है. आज जिस तरह से कश्मीर सुलग रहा है उसके लिये जिम्मेवार कहीं न कहीं आज़ाद भारत के वो सारे नागरिक भी हैं, जिन्होंने कट्टरवाद या सांप्रदायिकता के चलते कश्मीर समस्या को नकारा और अपने स्वार्थोंं की आपूर्ति में मगन रहे. हालांकि आज भी इस समस्या का निदान संभव है बस जरूरत है सत्ता पक्ष के नेताओं की इच्छाशक्ति की और भारत के सभी नागरिकों के एक सफल प्रयास की भी, जिससे कश्मीर को ये लगे कि वो भारत से अलग नहीं है और भारत के सभी नागरिक उन्हें अपना मानते हैं.




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