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Home गेस्ट ब्लॉग

कर-नाटकः वामपंथ कब तक घिसटता रहेगा ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 21, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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कर-नाटकः वामपंथ कब तक घिसटता रहेगा ?

कर्नाटक में राजनीतिक उठापटक का पहला अध्याय समाप्त हो गया. इसमें सुप्रीम कोर्ट की भूमिका निर्णायक बन गयी, अन्यथा राज्यपाल ने तो खरीद-फरोख्त का पूरा अवसर दे ही दिया था. राजनीतिक मोरचे पर 2014 के बाद पहली बार कांग्रेस ने मजबूत विपक्ष की भूमिका निभायी है. इसे 2019 का रिहर्सल जैसा माना जा रहा है. इसलिए इसका महत्व क्षेत्रीय से ज्यादा राष्ट्रीय है.

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यूपी विस चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद पूंजीवादी विपक्ष में जो निराशा पैदा हुई थी, उसे गोरखपुर और फूलपुर ने दूर करने का संकेत दिया था और कर्नाटक ने पुष्ट कर दिया कि विपक्षी एकता से भाजपा की हार हो सकती है.

इससे राष्ट्रीय राजनीति में हर क्षेत्रीय क्षत्रप की भूमिका प्रभावी हो जायगी और जो भाजपा की दादागीरी से त्रस्त हैं, उनके लिए सौदेबाजी का नया दरवाजा खुल जायगा. इसका प्रभाव भाजपा शासित राज्यों के अगले चुनाव पर निश्चित पड़ेगा.

लेकिन जनता के जनतंत्र की लड़ाई में कुछ ज्यादा फर्क पड़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती. हांं, भाजपा के बेलगाम फासिस्ट मिजाज पर लगाम की स्थिति जरूर पैदा हो जायेगी. इसका लाभ देश की जनता अपने हित में तब तक नहीं उठा सकती जब तक क्रांतिकारी व जनवादी शक्तियां उसे गैर-संसदीय संघर्ष में नहीं उतार देतीं.

इस दृष्टि से देखा जाय तो जितनी अराजकता पूंजीवादी राजनीति में है, लगभग उतना ही अवसरवाद क्रांतिकारी राजनीति में है. पिछले दिनों हमारे देश की तीन कम्युनिस्ट नामधारी पार्टियों का अधिवेशन हुआ है और सबने इस आशय का निर्णय किसी न किसी रूप में लिया है कि भाजपा को परास्त करने के लिए कांग्रेस तक से वे हाथ मिलाने को तैयार हैं.

कर्नाटक घटना क्रम से उनके निर्णय को बल मिलेगा लेकिन 1960 के दशक के गैर-कांग्रेसवाद से लेकर आज के गैर-भाजपावाद पर गौर करें तो यह सवाल जेहन में जरूर उठेगा कि वामपंथ उनके पीछे कब तक घिसटता रहेगा. वह दिन कब आयेगा जब हम केन्द्र में होंगे और शासक वर्ग विरोधी बीच की सभी शक्तियां हमारे इर्द-गिर्द जमा होंगी ? वह दिन अभी बहुत दूर है लेकिन वह तभी आयेगा जब हम आज से उस दिशा में कदम उठाना शुरू करेंगे. आज की नामी-गिरामी कम्युनिस्ट पार्टियों से उस दिशा में कदम उठाने की उम्मीद नहीं की जा सकती.

– संजय श्याम

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