Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

वेलेंटाइन डे : मधुमास और प्रेम का व्यवसायीकरण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 12, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

वेलेंटाइन डे : मधुमास और प्रेम का व्यवसायीकरण

गुरूचरण सिंह

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

आजकल वेलेंटाइन बिरादरी बहुत व्यस्त है. देखते ही बनता है उनका उत्साह ! किसी के भी पास सिर खुजलाने तक की फुरसत नहीं है. इतने सारे दिन त्योहार जो हैं भाई जो एक के बाद एक धड़ाधड़ चले आ रहे हैं – कभी रोज़ डे,कभी प्रपोज़ डे, कभी टैडी डे, कभी बियर डे तो कभी किस डे और अंत में इन सब की परिणति होती है वेलेंटाइन डे में. फरवरी आई नहीं कि किशोर छात्रों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक सभी इस अगेती फगुआ की नशीली ब्यार में झूमने लग जाते हैं. साल में महज़ एक ही बार आने वाले इतने सारे प्रेम के इन दिवसों को अब मनाना भी तो है और अपने यहां तो मनाने का मतलब अब अपने वेलेंटाइन यानि प्यार के लिए हैसियत से बढ़ कर उपहार खरीदना होता है और अगर ऐसा उपहार खरीदना है तो उसके लिए रुपए पैसे की व्यवस्था भी तो करनी होगी.

प्रेम के इसी तिजारती रूप के साथ सामंती सोच भी मिल जाती है तो दिखता है कामुकता और गुंडई का वह घृणित दृश्य जो गार्गी कॉलेज में देखने को मिला. प्रिंसिपल खामोश, पुलिस मूकदर्शक, राहगीर सारे के सारे तमाशबीन, मीडिया की साजिशी चुप्पी और लोगों के मनोरंजन का सामान बनी बेचारी छात्राओं की चीख-पुकार दबंगों को और उत्तेजित करती है, वे और भी ज्यादा कामांध पशु बन जाते हैं, निरीह छात्राओं के दुप्पटे हवा में उड़ने लगते हैं, उनकी छातियां मसली जाती हैं, किस किया जाता है, इससे भी मन नहीं भरता तो उनके सामने हस्तमैथुन का मुजाहिरा किया जाता है लेकिन संस्कृति को बचाने का दावा करने वाली राजनीति तो व्यस्त होती है दहशत के माहौल में वोटों के ध्रुवीकरण करके दिल में चुकी दिल्ली के बांस की फांस को निकालने में. वैसे भी बेकार नौजवान तभी उसके लिए काम करेंगे न जब उनकी ‘जरूरतों’ का ख्याल रखा जाएगा !!

वैसे भी हमारे यहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पहले से ही जीवन के चार लक्ष्य निर्धारित कर दिए गए थे; ‘जां की रही भावना जैसी’ की तर्ज पर जिसको जो रुचे वह उसी राह पर चल पड़े. धर्म और मोक्ष का झुनझुना उनके लिए जिनकी जरूरत आपको अपनी ‘महंती की गद्दीं’ बचाए रखने के लिए है, वरना झुकाव तो हमारा पूरी तरह अर्थ और काम की ओर ही है, वरना मंदिरों में भी रति क्रीड़ा का नग्न प्रदर्शन न होता और न ही धर्म का इस तरह से बेहूदा व्यवसायीकरण हुआ होता. न तो वेश्यावृत्ति ही दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय होता, भले ही अपने देश में उसे देवदासी प्रथा जैसी धार्मिक मान्यता क्यों न प्राप्त हो और न ही ‘कामसूत्र’ से लेकर रीतिकालीन परंपरा के साहित्य की रचना, मुंबइया फिल्मों का भौंड़ा देह प्रदर्शन और ‘ब्लू फिल्मों’ का इतना बड़ा बाजार न बन गया होता.

दरअसल वेलेंटाइन डे ने प्यार को एक संकुचित अर्थ तक ही सीमित कर दिया है. दरअसल उपहार देकर, तरह-तरह से रिझा कर नया रिश्ता बनाने की चाहत ही उसके केंद्र में है. देह से शुरू हो कर देह पर ही खत्म हो जाने वाले रिश्ते अगर बनते हैं तो देह पर टूट भी जाते हैं. जहां पर शुरू वहीं पर खत्म. फिर से एक नए रिश्ते की तलाश ! लेकिन जब ग़ालिब मियां फरमाते हैं कि ‘इक आग का दरिया है और डूब के जाना है’, तो उसकी कैफियत समझ नहीं आती ! वह कैसा प्यार है, कैसा जनून है, यह जो किसी की खुशी के लिए खुद को भी फ़ना कर सकता है. वेलेंटाइन बिरादरी के लिए यह सब ‘रूमानी बातें’ हैं. उसे यह सब समझ में नहीं आता कि कैसे मुमकिन हो सकता है कि कोई किसी दूसरे व्यक्ति या मकसद के लिए ‘सारी दुनिया’ को छोड़ दे !! दरअसल बड़ी ही ‘प्रैक्टिकल’ है यह बिरादरी भी ! तभी तो वह उसे ‘असल प्यार’ नहीं ‘रूमानी प्यार’ कहती है.

प्राची और सामी दोनों ही परम्पराएं प्रेम का आरंभ देह से ही मानती हैं. कुछ प्रेम प्रसंग देह से शुरू हो कर देह तक सीमित रह जाते हैं. ‘जर,जोरू,जमीन’ को हासिल करने के लिए होने वाले खून-खराबे के पीछे भी यही नजरिया है. ऐसा प्रेम बांधता है कई दायरों में ! लेकिन असल प्रेम अपने प्रेमी को मोहपाश में बांधता नहीं कार्ल मार्क्स की तरह आजाद कर देता है. देह से शुरू हो कर हमारा प्रेम विकास के कई मरहले तय करते हुए ‘मैं’ से ‘पर’ तक की तमाम सीमाओं को भी लांघ जाता है, उस में कुछ इस तरह विलीन हो जाता है कि दोनों में कोई भी, कैसा भी अंतर नहीं रह जाता. यहीं वह बिंदु है जहां राधा कृष्ण हो जाती है और कृष्ण राधा; हीर कह उठती है, ‘रांझा रांझा कैहंदी नी मैं आपैई रांझा होई’, रामकृष्ण परमहंस और मीरा के लिए तो लोक मर्यादा का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता. प्रिय की खुशी, प्रेमी को दूसरों के दुख दूर करने में अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए प्रेरित करती है. तभी तो कोई ईसा ‘दूसरों के पाप’ अपने सिर पर लेकर खुशी-खुशी सलीब पर लटक जाता है, ‘अनलहक़’ कहता हुआ कोई मंसूर सूली पर लटक जाता है, कोई गुरू अर्जुन देव गर्म तवे पर बैठ जाता है, खौलते पानी में डुबकी मारने से भी नहीं डरता, और अपने प्रिय का ‘भाणा (रज़ा) मीठा लागे’ की बात करता है और कोई तेग बहादुर चेहरे पर बिना कोई शिकन लाए चांदनी चौक में सर कटा लेता है.

लेकिन यह सब तो वेलेंटाइन बिरादरी के समझने की चीज़ है ही नहीं. उन बेचारों क्या पता कि वे सभी तो प्यार के नहीं प्यार के व्यवसायीकरण के शिकार हैं. हमने जब धर्म तक को ही नहीं छोड़ा एक फायदेमंद धंधा बनाने से, तो इस प्यार (उनकी नज़र से काम व्यापार) की क्या औकात है भला ! कुंभ मेले के लिए पांच हजार करोड का बजट कोई धार्मिक कारणों से निर्धारित नहीं किया जाता ! वह भी एक कारण हो सकता है लेकिन असली निशाना तो राजनीतिक हित साधना होता है, अपने ‘काम के’ चमचों/समर्थकों को मेले की व्यवस्था के लिए करोड़ों के ठेके दे कर. दरअसल इन धार्मिक आयोजनों की आड़़ में व्यापारिक हित साधे जाते हैं, भले ही वे आयोजन किसी भी मज़हब के हो ! प्यार के इस व्यवसाय के बाजार का मूल्य भी खरबों डॉलर का हैं. इस बाजार को चलाने वाले खिलाड़ी क्यों चाहेंगे कि आप इस ‘आग के दरिया’ में उतर जाए और उनका सारा कारोबार चौपट हो जाए  इसलिए विज्ञापनों की चकाचौंध से दिमाग को ही सुन्न कर दिया जाता है.

Read Also  –

छात्रों के खिलाफ मोदी-शाह का ‘न्यू-इंडिया’
गार्गी कॉलेज में छात्राओं से बदसलूकी
नालंदा और तक्षशिला पर रोने वाला अपने समय की यूनिवर्सिटियों को खत्म करने पर अमादा है
स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व बनाम आरएसएस
झूठ का व्यापारी 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

दिल्ली के नतीजों ने नफ़रत की राजनीति को शिकस्त दी है ?

Next Post

तो क्या मोदी-शाह की राजनीति की मियाद पूरी हुई

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

तो क्या मोदी-शाह की राजनीति की मियाद पूरी हुई

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

कोरोना ने राजनीति और उससे उपजी सत्ता के चरित्र का पर्दाफाश किया

April 28, 2020

हमारी दुर्गति हमने खुद ही की हुई है, पिट सब रहे हैं पर अलग-अलग

August 13, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.