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सर्वाइवरशिप बायस क्योंकि मुर्दे अपनी कहानियां नहीं सुनाते

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 5, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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सर्वाइवरशिप बायस क्योंकि मुर्दे अपनी कहानियां नहीं सुनाते

विश्वभर के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत पढ़ाने के लिए जो मुख्य किताबें दशकों तक प्रयोग होती रही हैं, उनमें से एक है रॉबर्ट वॉल्ड की 1984 में आयी किताब ‘General Relativity’. रॉबर्ट वॉल्ड सामान्य सापेक्षता सिद्धांत पर ही महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक हैं और इस विषय पर सौ के क़रीब शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं. उनकी यह किताब शोध छात्रों और वैज्ञानिकों के लिए आज भी एक संदर्भ पुस्तिका का कार्य करती है. हालांकि एक रेगुलर कोर्स में अब शॉन कैरल की 2004 में आयी ‘Spacetime and Geometry’ ज़्यादा प्रयोग की जाने लगी है.

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अब बात रॉबर्ट वॉल्ड की नहीं बल्कि उनके पिता अब्राहम वाल्ड की करते हैं. अब्राहम वाल्ड आस्ट्रिया-हंग्री साम्राज्य में एक यहूदी परिवार में जन्मे थे. घर वाले अच्छे खासे पढ़े लिखे थे तो कॉलेज से पहले की सारी शिक्षा इनकी घर में ही करायी गयी. बड़े होकर ये एक बड़े गणितज्ञ बने.

1938 में हिटलर ने जब आस्ट्रिया पर आक्रमण करके उस पर क़ब्ज़ा जमा लिया, तब वहां रह रहे सभी यहूदियों के बुरे दिन शुरू हो गए. अब्राहम वाल्ड को अमेरिका से अर्थशास्त्र की गणित में कार्य करने के लिए बुलावा आया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया, जिसके बाद वो हमेशा हमेशा के लिए अमेरिका में ही बस गए. जर्मनी और उसके आसपास फैले यहूदी विरोधी विचारधारा के कारण आइन्स्टाइन समेत जो तमाम यहूदी ऐसा करने को मजबूर हुए थे, वाल्ड भी उन्हीं में से एक थे.

अमेरिका आने के बाद उन्होंने कोलम्बिया यूनिवर्सिटी ज्वाइन की और वहां के सांख्यिकी में शोध करने वाले समूह का हिस्सा बने. उनके पुत्र रॉबर्ट वॉल्ड 1947 में अमेरिका में ही जन्मे. 1950 में भारत सरकार ने उनको कई सारे लेक्चर देने के लिए एक लम्बे टूर पर भारत बुलाया. वह अपनी पत्नी के साथ भारत आए और अपना लेक्चर कार्य आरम्भ किया.

वह दिसम्बर में कलकत्ता के Indian Statistical Institute (ISI) में भी आए और जनवरी में उनको Indian Science Congress में हिस्सा लेने बैंग्लोर जाना था. 13 दिसम्बर 1950 को Air India से यात्रा के समय नीलगिरी पर्वत में उनका प्लेन क्रैश हो गया, तब वह 48 साल के थे.

दुनिया ने एक महान अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद और उनके बच्चों ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया था. रॉबर्ट वॉल्ड उस समय महज़ तीन वर्ष के थे पर अपने माता पिता के साथ न होकर अमेरिका में ही थे, नहीं तो उस दिन दुनिया एक होने वाला भौतिक वैज्ञानिक भी खो देती.

बात दूसरे विश्व युद्ध की है. ब्रिटिश ऐअरफ़ोर्स के ढ़ेरों विमान जर्मन गोलियों का शिकार हो रहे थे. इससे बचने के लिए तय किया गया कि विमानों में एक्स्ट्रा मेटल शील्ड लगायी जाए, जिससे वो गोलियों का सामना कर सकें. मगर पूरे विमान में एक्स्ट्रा शील्ड सम्भव नहीं है, कारण है उनका ढ़ेर सारा भार. ज़्यादा भार प्लेन की कार्यक्षमता को कम करेगा, तो शील्ड केवल कम से कम जगह में ही लगाई जा सकती है. मगर लगायी कहां जाए ?

सभी बचकर आए विमानों में लगी गोलियों का अध्ययन किया गया और सभी प्राप्त डेटा के हिसाब से इनका एक प्लॉट तैयार किया गया जो संलग्न चित्र की तरह दिखता था. प्लॉट को देखें तो इसमें मुख्यतः दो जगह हैं – एक तो वो जहां पर सबसे ज़्यादा गोलियां लगी हैं और दूसरा वो जहां पर न के बराबर गोलियां लगी हैं. तो इस डेटा के आधार पर आपको क्या लगता है, सेना और बाक़ी लोगों ने कहां पर शील्ड लगाना चुना होगा ?

स्वाभाविक था जहां पर सबसे ज़्यादा गोलियां लगी हों वहां पर. मग़र जब यही समस्या हमारे सांख्यिकीविद अब्राहम वाल्ड के सामने आयी तो उन्होंने बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाला सुझाव दिया. उन्होंने सुझाया कि जहां पर न के बराबर गोलियां लगी हैं, शील्ड वहां पर लगायी जानी चाहिए.

उन्होंने समझाया कि ये जो डेटा है वह बायस्ड है. गोलियां तो विमान के सभी हिस्सों में लगी होंगी मगर हमको दिखायी केवल कुछ ही हिस्सों में दे रही हैं, कारण ये है कि हमारे पास केवल उन विमानों का डेटा है जो बचकर वापस आए हैं, और बचकर वही विमान आ पाए हैं जिन्होंने गोलियां झेल ली हैं. जो विमान गोलियां नहीं झेल पाए वो आ ही नहीं पाए. उन विमानों को गोलियां वहीं लगीं होंगी जहां पर इस डेटा में हमको गोलियां नहीं दिखायी दे रही हैं. जहां पर ज़्यादा गोलियों के निशान हैं, वहां पर लगी गोलियां तो विमान झेल ही लेते हैं.

यह कहानी इतनी मशहूर है कि अगर आप इंटरनेट में रॉबर्ट वाल्ड का नाम भी सर्च करेंगे तो भी पहले ही पेज में आपको उपरोक्त कहानी के कई संस्करण मिल जाएंगे, पर क्या यह कहानी वाक़ई सत्य है ? यह कहना मुश्किल है, क्योंकि वाल्ड के द्वारा लिखा गया या उन पर लिखा गया जो भी प्रामाणिक दस्तावेज़ उपलब्ध है, उसमें कहीं भी ऐसी किसी कहानी का उल्लेख नहीं है.

मगर वाल्ड ने वार प्लेन के सर्वाइवलशिप को लेकर बहुत कार्य किया था और वह कार्य बहुत ही टेकनिकल है. हो सकता है किसी ने उसी कार्य को आसान भाषा में समझाने के लिए यह कहानी गढ़ दी हो. सच जो भी हो मगर इस कहानी में वाल्ड जिस बायस की बात कर रहे हैं, उसे सर्वाइवरशिप बायस कहते हैं. यह बायस हमारे चारों ओर किस हद तक फैला हुआ है और किस क़दर हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते.

हममें से बहुत लोगों को मोटिवेशनल स्पीच सुनने का बहुत शौक़ होता है. इनको सुनने के बाद से थोड़ी देर के लिए ही सही हममें एक जोश आ जाता है, जो कि बहुत जल्दी उतर भी जाता है क्योंकि इस जोश के पीछे भी डोपामाइन और इंडोर्फ़िन जैसे हार्मोंस ही होते हैं और हार्मोंस का असर भला कितनी देर तक रहेगा ? ख़ैर, अगर आप भी उन्हीं में से एक हैं तो आपने दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की लिस्ट में से एक अलीबाबा समूह के मुखिया चीन के ‘जैक मा’ का नाम ज़रूर सुना होगा. नहीं सुना तो यूटूब खोलकर देखिए आपको इनके तमाम वीडिओ मिलेंगे और उनमें से ज़्यादातर बैकग्राउंड में सॉफ़्ट म्यूज़िक लगाकर मोटिवेशनल वीडिओ के रूप पेश किए गए होंगे.

अपने एक इंटरव्यू के दौरान मा बताते हैं कि उन्होंने अपने कैरियर की शुरूवात में 30 अलग-अलग तरह की नौकरियों के लिए आवेदन किया था और उन्हें किसी में भी नौकरी नहीं मिली. वो पुलिस में गए. 5 में से 4 लोगों को चुना गया पर उन्हें नहीं। जब KFC चीन में आयी तब उन्होंने वहां भी आवेदन किया. KFC में 24 लोगों में 23 लोगों को चुन लिया गया, मगर बस उन्हें ही नहीं चुना गया.

मा कहते हैं कि उन्होंने हॉर्वर्ड के बिजनेस स्कूल में भी 10 बार अप्लाई किया, मगर हर बार उनका ऐप्लिकेशन रिजेक्ट कर दिया गया. मा की कही गयी बातें वाक़ई सच हैं या नहीं वो तो वही जानें, मगर अपनी बात के साथ वह एक पर्फ़ेक्ट मोटिवेशनल स्टोरी की सभी शर्तें ज़रूर पूरी कर देते हैं.

मार्क ज़ुकरबर्ग हॉर्वर्ड से थे और इन्होंने फेसबुक पर पूरा समय काम करने के लिए कॉलेज बीच में ही छोड़ दिया. बिल गेट्स हॉर्वर्ड से थे और इन्होंने माइक्रोसॉफ़्ट पर ध्यान देने के लिए कॉलेज बीच में छोड़ दिया. ऐप्पल के स्टीव जाब्स भी कॉलेज ड्रॉपआउट ही थे. अब कल्पना करें आप एक कॉलेज में हैं, पढ़ाई में मन नहीं लग रहा. ग्रेड अच्छे नहीं आ रहे. डर है कि फ़ेल न हो जाएं .तभी आप ख़ुद को मोटिवेट करने के लिए यू-टूब खोलते हैं और उस पर आप इन लोगों की कहानियां देखते हैं.

आपको तसल्ली होती है कि डिग्री-विग्री मायने नहीं रखती, बिना डिग्री के भी आदमी इतना बड़ा बन जाता है. बस अपने ड्रीम को फ़ॉलो करना चाहिए. आपके दिमाग़ में ‘फ़ील गुड’ वाले हार्मोंस रिलीज़ होते हैं और आप थोड़ी देर के लिया अच्छा महसूस करते हैं.

कल्पना करें आप नए-नए कॉलेज से पास हुए हैं, पर आप नौकरी नहीं करना चाहते या फ़िर आप नौकरी ही कर रहे हैं पर अपनी नौकरी से ख़ुश नहीं हैं और आपको कोई नया व्यवसाय शुरू करना है. ख़ुद की कम्पनी खोलनी है. पर यह काम जोख़िम भरा होता है. आप दुनिया के तमाम सफ़ल entrepreneurs को देखते हैं. गूगल, फेसबुक, माइक्रसॉफ़्ट से लेकर पता नहीं कहां कहां के  entrepreneurs की सक्सेस स्टोरीज़ पढ़ने लगते हैं.

आप उस सबसे मोटिवेट होते हैं. आपको अपना काम करने की शक्ति मिलती है. मग़र इन सभी में एक प्रॉब्लम है. प्रॉब्लम ये है कि TED टॉक से लेकर मोटिवेशनल किताबों तक आपको ज़्यादातर केवल उन्हीं लोगों की कहानियां सुनाई पड़ती हैं, जो भले ही कितनी तकलीफ़ों से गुज़रे हों पर अंत में सफ़ल हो गए हों. क्योंकि जो सफ़ल नहीं होते उनके पास सुनाने के लिए कोई मसाला वाली कहानी नहीं होती और वो अपनी कहानी कहीं नहीं सुनाने जाते और अगर सुनाएं भी तो एक असफ़ल आदमी की कहानी सुनेगा भी कौन ? यह भी वही सर्वाइवरशिप बायस का एक उदाहरण है.

मेरे पास डेटा नहीं है, जो भी डेटा कहीं भी मिलेगा वह सर्वाइवरशिप बायस का शिकार ही होगा, मगर यदि होता तो पता चलता कि ‘सेम सिचुएशन’ में आगे जाकर कितने प्रतिशत कॉलेज ड्रॉपआउट सक्सेस होते हैं और कितने प्रतिशत entrepreneurs सफ़ल होते हैं ? शायद यह रेट 10% भी नहीं होता.

चाहे किसी गाने वाले को ले लो, नाचने वाले को ले लो, फ़िल्म स्टार को ले लो, क्रिकेट खेलने वाले को ले लो, पेंटिंग बनाने वाले को ले लो या किसी को भी ले लो. इनके बारे में बताया जाएगा कि कैसे अपने सपने का पीछा करते-करते और कैसे सभी कठिनाइयों का सामना करते ये इस मुक़ाम तक पहुंच गए हैं. इसलिए कोई भी इसी तरह मेहनत करके, अपने सपने का पीछा करके और कठिनाइयों का सामना करके सफ़लता पा सकता है.

मगर आपको मीडिया में केवल उसी की कहानी ज़्यादा दिखायी पड़ती जो कुछ बन गए हैं. जो ये सब टैलेंट होने के बाद भी, इतना मेहनत करने के बाद भी किसी वजह से कुछ बन ही नहीं पाए उनकी कहानी हमें नहीं दिखती. या दिखती भी है तो कभी भूले भटके ही दिखती है, और देखने के कुछ समय बाद वो भी हम भूल जाते हैं. असफलताओं की कहानियां सफलताओं की कहानियों से कहीं ज़्यादा होती हैं, पर फ़िर भी वो हमें सर्वाइवरशिप बायस के कारण सुनायी नहीं पड़ती.

आपको अक्सर कोई कहने वाला मिल जाता होगा कि पहले की चीज़ों में जो बात थी वो अब कहां ? पहले की चीज़ें ज़्यादा चलती थीं. ज़्यादा टिकाऊ होती थीं. दरअसल ये भी इसी सर्वाइवरशिप बायस का कमाल है. पहले भी सभी तरह की चीज़ें बनती होंगी, कम टिकाऊ से लेकर ज़्यादा टिकाऊ तक. मगर जो भी चीज़ें कम टिकाऊ थीं वो कब का जंग लगकर ख़राब हो गयी होंगी, सड़ गल गयी होंगी, फेंक दी गयी होंगी. जो सामने दिख रहा है वो केवल वही समान दिख रहा है जो इतने समय तक टिक गया है.

इसी तरह से पुरानी इमारतों को भी ले लो। लोग पुरानी सुंदर रचनाओं, इमारतों, मंदिरों, पिरामिडों आदि की बात करते हुए कहते हैं पहले उतनी तकनीक नहीं थी फ़िर भी कितनी ग़ज़ब की चीज़ें बनायी हैं पुराने लोगों ने. पहले का मटेरियल ज़्यादा अच्छा होता था, पहले बनाने की कला ज़्यादा अच्छी होती थी इसलिए वो आज तक खड़ी हैं. जबकि आज बनायी हुई इमारतें कितनी जल्दी गिर जाती हैं और उनकी बार-बार मरम्मत की ज़रूरत पड़ती हैं. बस कुछ ही ठीक-ठाक बनती हैं. ये भी सर्वाइवरशिप बायस ही है.

पहले भी सभी तरह की इमारतें होती होंगी. अच्छी, ख़राब, कमज़ोर, मज़बूत सब तरह की. बस आज बची केवल मज़बूत वाली हैं इसलिए आपके पास तुलना करने के लिए कुछ है ही नहीं और इससे आपको लगता है कि पहले सब ही ठीक ही बनती थी.

नोट : यहां पर टिप्पणी इस बात को लेकर नहीं है कि पहले अच्छा होता था या नहीं और न ही टिप्पणी मोटिवेशनल कहानियों की उपयोगिता पर है. टिप्पणी इस पर है कि कैसे यह बायस हमारे आसपास होते हैं और मनोवैज्ञानिक तौर पर हमारी भावनाओं और सोचने समझने की क्षमता को प्रभावित करते हैं. हम आसपास जो ज़्यादा देखते हैं उसी से ज़्यादा प्रभावित होते हैं. और हमको आसपास केवल वही दिखायी देता है जो सर्वाइव कर चुका होता है क्योंकि मुर्दे अपनी कहानियां नहीं सुनाते.

  • अनमोल

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