Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला : जनतंत्र का अर्थ है तानाशाही का प्रतिरोध

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 30, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला : जनतंत्र का अर्थ है तानाशाही का प्रतिरोध

CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट के कल के फैसले के बाद अरुण जेटली ने ‘सरकार की जीत हुई’ के अपने स्थायी भाव में यह कह दिया कि अब दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा. सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में एक निश्चित समय सीमा के अंदर आलोक वर्मा पर लगाये गये अभियोगों की जांच से अब इस मामले में प्रकृत न्याय होगा.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

लेकिन जेटलीजी को यह नहीं दिखाई दिया कि अदालत में खड़े होकर उनकी सरकार के वकील वेणुगोपाल ने क्या मांग की थी ?

वहां उन्होंने साफ कहा था कि इतने कम समय में इन सब अभियोगों की जांच संभव नहीं है. वे सिर्फ तीन हफ्ते की नहीं, एक प्रकार से अनिश्चित काल तक इस जांच को चलाने का अधिकार मांग रहे थे !




बहरहाल, जेटली कुछ भी कहे, अब बहुत जल्द ही उनकी दक्षिणपंथी सोच के लोग, इस प्रकार की दलीलों के साथ बाजार में उतरने लगे हैं कि ….”यह पूरा मामला महज प्रशासन से जुड़ा हुआ मामला था. इस प्रकार के मामलों में प्रथमत: तो सुप्रीम कोर्ट को दखल ही नहीं देना चाहिए था और अगर दिया भी है तो सोचना चाहिए था कि इतने कम समय में सारे गवाहों के साक्ष्यों को जुटा कर कैसे इन गंभीर अभियोगों पर आखिरी राय तक पहुंचा जा सकेगा ? वे यह भी दलीलें दे रहे हैं कि इससे तो किसी भी सरकार का काम करना ही असंभव हो जायेगा.”

इस प्रकार, इन दलीलों में बड़ी चालाकी से इस सच्चाई को छिपा लिया जा रहा है कि यह पूरा मामला किसी साधारण सरकारी कर्मचारी का मामला नहीं है. यह एक ऐसे पद से जुड़ा हुआ मामला है जिसकी स्वायत्तता को देश में कानून का शासन बने रहने देने के लिये जरूरी माना गया है और इसीलिये उस पर नियुक्ति के लिये अलग से एक संवैधानिक कॉलेजियम होता है और उसके कार्यकाल आदि विषयों को अलग से कानूनी प्राविधानों से सुरक्षित किया गया है.




जो लोग सरकारी कर्मचारी को महज सरकार का वेतनभोगी व्यक्ति मानते है,
वे जनतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की हैसियत के महत्व को तो कभी नहीं समझ सकते हैं.

जनतंत्र का दूसरा औपचारिक, तात्विक मायने होता है ‘कानून का शासन.’

जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही कानून बनाते हैं लेकिन वे उन कानूनों को अपनी मन-मर्जी से तोड़ने-मरोड़ने के लिये स्वतंत्र नहीं होते हैं.

शासकों के स्वेच्छाचार का जनतंत्र में कोई स्थान नहीं होता है, बल्कि यह शासकों के स्वेच्छाचार का ही प्रत्युत प्रत्युत्तर है.

कार्यपालिका के स्वेच्छाचार पर रोक लगाने का काम, जहां न्यायपालिका करती है, तो वहीं दूसरी संवैधानिक संस्थाएं भी अलग-अलग क्षेत्रों में वह काम करती है.

उनके गठन का उद्देश्य ही यही होता है कि जिन संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी सत्ताधारी के मनमाने हस्तक्षेप से कानून का शासन व्याहत हो सकता है, जनतंत्र की आत्मा को नुकसान पहुंच सकता है, उन खास क्षेत्रों को इन आशंकाओं से बचाने के लिये उन्हें रक्षा कवच मुहैय्या कराया जाए !




इसीलिये हर संवैधानिक संस्था या पद, एक प्रकार से जनतंत्र में न्यायपालिका के हाथों का ही विस्तार हुआ करती है.

इन संस्थाओं का विकास, जनतांत्रिक क्रियाशीलता के लगातार अनुभवों के बीच से पैदा होने वाली जरूरतों से होता है. मसलन् सन् ’75 के आंतरिक आपातकाल के बाद संविधान के 42वें संशोधन के जरिये नागरिक अधिकारों और मूलभूत अधिकारों की तुलना में, संविधान के निदेशक सिद्धांतों को वरीयता देने के नाम पर जो हमले किये गये थे, उन्हें परवर्ती दिनों में खारिज करके संसद के द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिकता को तय करने के मानदंडों के तौर पर उन अधिकारों को स्थापित किया गया. संसद के द्वारा पारित कानूनों को भी संविधान-सम्मत, खास तौर पर नागरिकों के मूलभूत अधिकारों से सम्मत होना पड़ेगा.

इसीप्रकार, लोकपाल, सूचना का अधिकार आदि की तरह ही CBI का मसला भी एक गंभीर मसला है जिसके भारी दुरुपयोग ने भारतीय राजनीति में शासक दल के स्वेच्छाचार को बेहिसाब बल पहुंचाया है.




इसी अनुभव के आधार पर लोकपाल कानून की रोशनी में 2013 में CBI प्रमुख की नियुक्ति और उसके कार्यकाल और उसे हटाये जाने के सारे विषयों को आम कर्मचारी की नियुक्तियों से अलग करके ‘प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश के कॉलेजियम’ के अधीन लाया गया और निदेशक के इस पद को कानूनी स्वायत्तता प्रदान की गई !

इसका मूल मकसद ही यह था कि CBI की जांच संबंधी कार्यकलापों में, सरकार का बेजा हस्तक्षेप न होने पाए.

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह ही दूसरी तमाम स्वायत्त संवैधानिक संस्थाएं, मिल कर जनतंत्र को एक प्रकार का सांस्थानिक रूप प्रदान करते हैं. इस संस्थान के संचालन के नियमों से इसके सारे घटक अपने-अपने स्तर पर बंधे होते हैं, यह जनतंत्र का अपना शील होता है. इसीलिये हैरोल्ड लास्की ने जनतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन को एक बहुत विशेषज्ञता का काम कहा था जिसमें शासन को उस जनता के हितों की रक्षा का दायित्व दिया जाता है जो अपने अधिकारों और हितों के बारे में पूरी तरह से जागरूक नहीं है.

जनतंत्र में हमेशा यह संभव है कि जनता किसी भी सामयिक प्रभाव में हिटलर और मुसोलिनी को चुन कर सत्ता पर बैठा दे, जो अतीत में हो भी चुका है.




यही जनतंत्र का अपना एक संकट भी है, जिसके पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण मुख्य तौर पर काम करते हैं. अर्थात्, जनतांत्रिक प्रक्रिया से ही जनतंत्र के अंत की कहानी लिखी जा सकती है. इस प्रकार के अघटन को रोकने के लिये ही जनतंत्र का यह सांस्थानिक ढांचा सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

जनतंत्र की आंतरिक संरचना, इन सभी अन्य स्वायत्त संस्थाओं से निर्मित होती है और उसे वह मजबूती प्रदान करती है ताकि वह अपने अंदर से ही किसी भी हिटलर या मुसोलिनी के प्रतिरोध कर सके.

इतिहास के अनुभवों को आत्मसात करते हुए इन संस्थाओँ के विकास के जरिये ही जनतंत्र का अपना आत्म-विस्तार होता है.

जो लोग जनतंत्र की आत्मा के इन तत्वों के महत्व को नहीं समझते हैं और सरकारी प्रशासन को ही सबसे अहम मानते हैं, वे कभी भी सुप्रीम कोर्ट के CBI के मामले में लिये जा रहे निर्णय का मर्म नहीं समझ पायेंगे. सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने पिछले दिनों जब अपने ही मुख्य न्यायाधीश से लगभग विद्रोह करते हुए यह चेतावनी दी थी कि जनतंत्र खतरे में है, उस चेतावनी के महत्व को भी ये लोग कभी नहीं समझ पायेंगे, क्योंकि उनके लिये हर संस्था को प्रशासन के महज एक मूक-बधिर अंग की भूमिका अदा करना चाहिए. अब भी वे राजशाही और जनतंत्र के बीच के मूलभूत अंतर को आत्मसात नहीं कर पाए हैं. इसीलिये वे यह कहते हुए पाये जाते हैं कि ‘इस प्रकार तो कोई सरकार काम ही नहीं कर सकेगी !’




यह बिल्कुल सही है कि जनतंत्र के ढांचे में ऐसी कोई सरकार काम नहीं कर सकती है जो मूलत: तानाशाही को थोपना चाहती है, राजशाही की तर्ज पर फासीवाद को लाना चाहती है. जनतंत्र का मर्म ही यही है कि ऐसी सरकार देश में न चलने पाए.

CBI के निदेशक को जबरन छुट्टी पर भेजने के सरकार के स्वेच्छाचार पर अंकुश की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय “जनतंत्र की आत्मा” का निर्णय है.

  • अरूण महेश्वरी





Read Also –

आरएसएस और भाजपा का “रावण”
संघ मुक्त भारत क्यों ?
ये कोई बाहर के लोग हैं या आक्रमणकारी हैं
देश को सबसे ज्यादा कर्ज में डुबाने वाले पहले प्रधानमंत्री बने मोदी




[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]




[ लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहे प्रतिभा एक डायरी को जन-सहयोग की आवश्यकता है. अपने शुभचिंतकों से अनुरोध है कि वे यथासंभव आर्थिक सहयोग हेतु कदम बढ़ायें. ]
Tags: CBIजनतंत्रसुप्रीम कोर्ट
Previous Post

ब्राजील में आया ट्रंप, पूतिन और दुतार्त का भी दादा

Next Post

भारत में सरकारी तंत्र और आम आदमी

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

भारत में सरकारी तंत्र और आम आदमी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

भूख

July 7, 2020

मंडी

June 23, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.