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आक्रोशित चीखें ऐसा कोलाहल उत्पन्न करती हैं, जिसमें सत्य गुम होने लगता है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 18, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
1
3.3k
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बात होनी चाहिये कि बीते वर्षों में हमारे नीतिकार कश्मीर में आगे बढ़े हैं या उन्होंने हालात को और अधिक उलझा कर रख दिया है. क्योंकि…जैसा कि बताया जा रहा है, आमतौर पर आत्मघाती हमलावर पाकिस्तान से आते रहे हैं लेकिन इस बार यह आत्मघाती युवक भारत-भूमि का ही है. पुलवामा के बगल के किसी देहात का. आतंक के प्रणेताओं के कदम इतने प्रभावी कैसे होते जा रहे हैं ? एक अंधा युद्ध, जिसका हासिल दोनों ओर के नौजवानों की मौतों के रूप में सामने आता रहता हो. जिन संसाधनों को लोगों के जीवन की बेहतरी में लगना था, वे हथियार कंपनियों की कभी तृप्त न होने वाली पैशाचिक प्रवृत्तियों की तुष्टि में लगते जा रहे हैं. रक्षा के नाम का बजट बढ़ता जा रहा है, मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. बाकी कुछ नहीं.

जो मरे…वे गरीब किसानों या निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के बेटे थे, जो देश के लिये प्राणों की आहुति देने की आकांक्षा से अधिक रोजगार पाने की लालसा में अर्द्धसैनिक बल में शामिल हुए थे. जिस युवक ने विस्फोटकों से लदा वाहन सिपाहियों की बस में टकरा कर खुद को भी उड़ा लिया और दर्जनों जाने ले लीं, उसका बाप साइकिल पर घर-घर जाकर कपड़ों की फेरी लगाता है. मरने वाले और मारने वाले की आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि में अंतर नहीं. जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिये जूझते दोनों के परिजन आज शोकमग्न हैं.

अपने लोगों की आशाओं के दीप आज मारे गए. मरने वाले भी शहीद…और उधर…मारने वाले को भी उनकी परिभाषाओं के अनुसार वे लोग शहीद ही कह रहे होंगे. हासिल क्या…? क्या भारत डर गया ? क्या कश्मीर हासिल हो गया ? नहीं. आतंक के योजनाकारों को पता था कि ऐसा कुछ भी हासिल होने वाला नहीं. लेकिन…जो उन्हें चाहिये था, वह हासिल हो गया. क्या चाहिये था उन्हें ?

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प्रतिक्रिया और प्रतिशोध की आग में जलते आम लोग. उनकी भावनाओं से खेलते नेता. प्रतिशोध की आग को बुरी तरह भड़काते टीवी चैनल…सीमा के इस पार भी, उस पार भी. विमर्श के मुद्दे बदल गए हैं. सर्वत्र शोक और आक्रोश का माहौल है. फिर से सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम उठाने की मांगें होने लगी हैं, जैसे पिछले सर्जिकल स्ट्राइक से कुछ हासिल होने का उदाहरण मौजूद हो !

एक अंधा युद्ध, जिसका हासिल दोनों ओर के नौजवानों की मौतों के रूप में सामने आता रहता हो. जिन संसाधनों को लोगों के जीवन की बेहतरी में लगना था, वे हथियार कंपनियों की कभी तृप्त न होने वाली पैशाचिक प्रवृत्तियों की तुष्टि में लगते जा रहे हैं. रक्षा के नाम का बजट बढ़ता जा रहा है, मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. बाकी कुछ नहीं.




समाधान…? यह किस चिड़िया का नाम है ? क्या आपको लगता है कि कोई इसके लिये गम्भीर भी है ? जिसने भी समाधान के लिये कदम बढ़ाए उनके रास्तों पर इतने कांटे बो दिए गए कि शान्तिकामियों के पैर लहूलुहान हो गए.

कौन हैं वे लोग…जो आतंक की फसल उगाते हैं ? उनकी फंडिंग का स्रोत क्या है ? उनके बृहत्तर उद्देश्य क्या हैं ? अगर इस पहलू पर सोचें तो अंधकार का लहराता सागर सामने नजर आने लगता है, जिसमें मानवता और उसकी चीखें विलीन होती जा रही हैं. कहीं संसाधनों पर कब्जे की तो कहीं जनसमूहों के मनोविज्ञान पर हावी होने की साजिशें हैं. उद्देश्य वही है…कर लो दुनिया मुट्ठी में.

मध्य पूर्व के तेल के स्रोतों पर कब्जे की साजिशों ने वहां आतंक के खौफनाक अध्यायों को जन्म दिया. इन्हीं साजिशों ने न जाने कितने आतंकी संगठनों को जन्म दिया, अनगिनत जानें लीं और सभ्यताओं को तबाही के मुहाने पर पहुंचा दिया. कुछ दूर बढ़ें नाइजीरिया की ओर. आखिर…यह क्या है कि नाइजीरिया में तेल के नए स्रोतों की खोज होती है और फिर…बोको हराम जैसा खूंखार आतंकवादी संगठन अस्तित्व में आ जाता है. धर्म और पहचान की कट्टरता इन शक्तियों के टूल के रूप में काम करने लगती है. लोग मरते रहते हैं, साजिशें परवान चढ़ती रहती हैं.

मुख्य धारा का मीडिया तो कब का इन अदृश्य शक्तियों का टूल बन कर अपनी भूमिका बदल चुका है. हिन्दी के कुछ चैनलों को देखें. लगता है जैसे…टीवी के पर्दों को फाड़ कर कुछ एंकर अभी निकलेंगे और सीमा पार जा कर आतंक के पनाहगाहों का सफाया कर देंगे. इन एंकरों की चीखें लोगों के खून के प्रवाह को गतिशील कर रही है, मन को उत्तेजना से भर रही है.




हमारे नेता कह रहे हैं, “ऐसा सबक सिखाएंगे कि वे भूलेंगे नहीं.“ अब तक क्यों नहीं सिखाया ? अब क्या कर लोगे ? कुछ को मार कर, कुछ को मरवा कर अपनी पीठ खुद ठोकोगे. हासिल कुछ नहीं. वे फिर मारेंगे, तुम फिर मारोगे. न तुम मरोगे, न वे मरेंगे. मरेंगे वे नौजवान…जिन्हें जीना था, जिनके जीने से दुनिया की खूबसूरती बढ़नी थी.

सवाल उठने चाहिये. बात होनी चाहिये, खुफिया विफलताओं पर. बात होनी चाहिये, राजनीतिक और रणनीतिक विफलताओं पर. आखिर इन्हीं विफलताओं ने हमारे इतने जवानों की बलि ली है. बात होनी चाहिये कि पूर्ण बहुमत की शक्तिशाली सरकार ने बीते पांच वर्षों में “शांतिपूर्ण समाधान“ या फिर “मुंहतोड़ जवाब“ के मामलों में कौन सी सफलताएं हासिल की हैं ? या कि देश में एक नकारात्मक ज्वार पैदा किया है, सिर्फ जो पहले किसी देश की सीमाओं से टकराता है और फिर अपने ही लोगों में ’गद्दार’ की तलाश करने लगता है.




बात होनी चाहिये कि बीते वर्षों में हमारे नीतिकार कश्मीर में आगे बढ़े हैं या उन्होंने हालात को और अधिक उलझा कर रख दिया है. क्योंकि…जैसा कि बताया जा रहा है, आमतौर पर आत्मघाती हमलावर पाकिस्तान से आते रहे हैं लेकिन इस बार यह आत्मघाती युवक भारत-भूमि का ही है. पुलवामा के बगल के किसी देहात का. आतंक के प्रणेताओं के कदम इतने प्रभावी कैसे होते जा रहे हैं ?

हम शोकमग्न हैं, आक्रोशित हैं. दोषियों को दंड मिलना चाहिये लेकिन उससे पहले दोषियों की शिनाख्त होनी चाहिये. क्या यह शिनाख्त हो पाएगी ? नहीं, हमारी नजर इतनी धूमिल है कि हम उनकी शिनाख्त आसानी से नहीं कर सकते. हम सिर्फ एक दूसरे को मार सकते हैं. कहने में दिल कांपता है लेकिन, यह नग्न सत्य है कि ऐसी घटनाओं से भारत और पाकिस्तान की जनविरोधी सत्ता-संरचनाओं को बल मिलता है, ढेर सारे बहाने मिलते हैं. सवाल उठने कम हो जाते हैं और आक्रोशित चीखें ऐसा कोलाहल उत्पन्न करती हैं, जिसमें सत्य गुम होने लगता है.

  • हेमन्त कुमार झा





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Tags: आतंक की फसलप्रतिक्रिया और प्रतिशोधमीडिया
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Comments 1

  1. Bond007 says:
    8 years ago

    J& K bhi hindustan ka hi hissa hai…Fir wha ki aawam me itni nafrat kyu hindustan k Army se…Jo pak se mil kr ya atanki se mil kr hindustani sena ko marte hai…Desh ki janta soche zara….Ya fir sarkaar apni kurshi k khatir ye dange aur hinsa krati hai…Aur ilzaam deti hai…Atankwaad ka..

    Reply

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